रांची के मोरहाबादी मैदान में आज से तीन दिवसीय हस्तशिल्प मेले की शुरुआत हुई है, जिसमें राज्य भर के कोने-कोने से आए कारीगरों ने अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन किया है। बांस की टोकरियों से लेकर पारंपरिक आदिवासी आभूषणों तक, यह मेला स्थानीय हुनर का अनूठा संगम है। मेले का उद्घाटन राज्य के संस्कृति मंत्री द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि झारखंड के कलाकारों के पास अद्भुत प्रतिभा है, लेकिन उन्हें उचित बाजार नहीं मिल पाता। यह मेला उन कलाकारों के लिए एक वरदान की तरह है जो बिचौलियों के बिना सीधे ग्राहकों तक अपने उत्पाद पहुंचाना चाहते हैं। मेले में पर्यटकों की भारी भीड़ देखी जा रही है।
कलाकारों की आजीविका में सुधार मेले का मुख्य उद्देश्य स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देना और कलाकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। बहुत से कलाकार सुदूरवर्ती गांवों से आए हैं, जिनके लिए यह पहली बार है जब उन्हें इतने बड़े स्तर पर मंच मिल रहा है। प्रशासन ने इन कलाकारों के लिए स्टॉल का शुल्क माफ कर दिया है ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के अपना सामान बेच सकें। इसके अलावा, मेले में डिजिटल भुगतान की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है ताकि नकदी की समस्या न हो। कई कारीगरों ने बताया कि पिछले कुछ सालों में बाजार की कमी के कारण वे अपने काम को छोड़ने के कगार पर थे, लेकिन इस मेले से उन्हें फिर से उम्मीद जगी है।
मेले में केवल खरीदारी ही नहीं, बल्कि आदिवासी नृत्य और संगीत के कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं, जो इसे और अधिक आकर्षक बनाते हैं। आगंतुकों के लिए स्थानीय व्यंजन स्टॉल भी लगाए गए हैं, जहाँ लोग पारंपरिक झारखंडी भोजन का स्वाद ले सकते हैं। प्रशासन की योजना है कि इस प्रकार के मेलों को अब हर दो महीने में आयोजित किया जाएगा ताकि निरंतरता बनी रहे। साथ ही, इन उत्पादों को ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी ले जाने की कोशिश की जा रही है ताकि उनकी पहुंच अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हो सके। यह प्रयास झारखंड की खोई हुई विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मेले के पहले दिन ही लाखों रुपये का व्यापार हुआ है, जिससे कारीगरों के चेहरों पर खुशी साफ देखी जा सकती है। यह कार्यक्रम आने वाले समय में राज्य की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा।