लखनऊ के कैसरबाग क्षेत्र में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां भारतीय खाद्य निगम (FCI) से सेवानिवृत्त अधिकारी अंसार जमाल अब्बासी और उनकी पत्नी को साइबर ठगों ने करीब 19 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर अपने नियंत्रण में रखा। इस दौरान जालसाजों ने दंपती को आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग के एक फर्जी मामले में फंसाने का डर दिखाकर उनसे करीब 42 लाख रुपये ठग लिए। पीड़ित की शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम थाने में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस के अनुसार, ठगी की शुरुआत 23 जुलाई को व्हाट्सऐप पर आई एक ऑडियो कॉल से हुई। कॉल करने वाले ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हुए दावा किया कि पीड़ित के नाम से एक सिम कार्ड और कर्नाटक में बैंक खाता मिला है, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर अवैध गतिविधियों में किया गया है। इसके बाद उन्हें गिरफ्तारी का डर दिखाकर कहा गया कि वरिष्ठ नागरिक होने के कारण उन्हें जेल नहीं भेजा जाएगा, लेकिन उन्हें और उनकी पत्नी को डिजिटल अरेस्ट में रखा जाएगा।
ठगों ने अपनी बात को सच साबित करने के लिए व्हाट्सऐप पर फर्जी सरकारी दस्तावेज और जांच एजेंसियों के लेटरहेड भी भेजे। अगले दिन एक दूसरे व्यक्ति ने वीडियो कॉल कर खुद को एटीएस अधिकारी बताया और दावा किया कि मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है। इसके बाद जालसाजों ने दंपती से उनके बैंक खातों, एफडी और पत्नी के गहनों से जुड़ी जानकारी हासिल की। उन्हें लगातार यह विश्वास दिलाया गया कि अगर उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। ठगों ने दंपती को बाहरी लोगों से संपर्क न करने के लिए भी दबाव बनाया, जिससे वे परिवार और परिचितों से मदद नहीं ले सके। डर और मानसिक दबाव का फायदा उठाकर आरोपियों ने 23 जुलाई से 10 अगस्त के बीच अलग-अलग बैंक खातों में कई किस्तों में करीब 42 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए।
मामले की शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम पुलिस ने जांच शुरू की। शुरुआती जांच में सामने आया कि ठगी के लिए इस्तेमाल किए गए छह मोबाइल नंबर अलग-अलग राज्यों से जुड़े थे और आरोपियों ने विदेशी आईपी एड्रेस का भी इस्तेमाल किया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए जालसाजों के दो बैंक खातों में ट्रांसफर किए गए 13.83 लाख रुपये फ्रीज कराने में सफलता हासिल की है। इससे पीड़ित परिवार को कुछ धनराशि वापस मिलने की उम्मीद बनी है, जबकि बाकी रकम और आरोपियों तक पहुंचने के लिए जांच जारी है।
यह घटना एक बार फिर बताती है कि साइबर अपराधी किस तरह कानून और जांच एजेंसियों का नाम लेकर लोगों में डर पैदा कर रहे हैं। आम लोगों को यह समझना जरूरी है कि किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा व्हाट्सऐप या वीडियो कॉल के माध्यम से इस तरह की ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ नहीं की जाती। अगर कोई व्यक्ति पुलिस, सीबीआई, ईडी, एनआईए या किसी अदालत का अधिकारी बनकर गिरफ्तारी का डर दिखाए और पैसे ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाए, तो तुरंत कॉल काटकर परिवार और संबंधित साइबर पुलिस से संपर्क करना चाहिए। ऐसे मामलों में डर के बजाय जल्द कार्रवाई करना सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि शुरुआती शिकायत मिलने पर बैंक खातों में गई रकम को फ्रीज कराने की संभावना बढ़ जाती है। लखनऊ का यह मामला साइबर अपराधियों के बढ़ते नेटवर्क और विशेष रूप से बुजुर्ग लोगों को निशाना बनाने के खतरे को भी उजागर करता है।