संघर्ष के दिनों में मिली थी साहिर से आर्थिक सहायता
हिंदी फिल्म जगत में पहचान बनाने के लिए जब एक नया लड़का मुंबई पहुंचा तब उसका कोई ठिकाना नहीं था। उस दौर में साहिर लुधियानवी ने उस युवा लेखक जावेद अख्तर को अपने आवास पर शरण दी थी। जावेद उन्हें अपना गुरु मानते थे और उनके साथ रहते हुए लेखन की कला सीख रहे थे। साहिर भी उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे और उनकी हर जरूरत का पूरा ख्याल रखते थे। एक बार साहिर को इस बात का अहसास हुआ कि जावेद को पैसों की सख्त आवश्यकता है। उनकी गरिमा और स्वाभिमान का पूरा सम्मान करते हुए साहिर ने दो सौ रुपए मेज के पास रख दिए थे। उस समय दो सौ रुपए की राशि बहुत बड़ी हुआ करती थी और सौ रुपए के खुले पैसे लेने के लिए भी लोगों को बैंक जाना पड़ता था। जावेद ने वो राशि स्वीकार कर ली और समय बीतने के साथ अपने करियर में आगे बढ़ते गए। सलीम खान के साथ उनकी जोड़ी ने जबरदस्त सफलता हासिल की और वह इंडस्ट्री के शीर्ष लेखकों में शामिल हो गए। पैसों की तंगी पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी और उनका जीवन बेहतर दौर में प्रवेश कर चुका था।
साहिर के निधन के बाद सामने आया वो पुराना किस्सा
सफलता मिलने के बाद भी जब कभी जावेद अख्तर अपने गुरु से मिलते तो उन दो सौ रुपयों का जिक्र करना नहीं भूलते थे। वह हमेशा मजाक में कहते थे कि अब वह यह रकम वापस नहीं लौटाएंगे। इस पर साहिर भी मजाकिया अंदाज में जवाब देते थे कि वह किसी भी हाल में अपने पैसे वसूल कर के रहेंगे। समय का पहिया आगे बढ़ा और पच्चीस अक्टूबर की एक शाम को जीवन में बड़ा मोड़ आया। साहिर को अपने डॉक्टर कपूर नाम के मित्र की अस्वस्थता की सूचना मिली और वह तुरंत उनसे मिलने पहुंच गए। दोनों पुराने दोस्त बिस्तर पर बैठकर आपस में ताश खेलने लगे और माहौल को खुशनुमा बनाने लगे। तभी डॉक्टर कपूर की नजर अपने मित्र के चेहरे के बदलते रंगों पर पड़ी और उन्होंने तुरंत चिंतित होकर पुकारा। साहिर को दिल का दौरा पड़ चुका था और उनके आखिरी शब्द जिंदगी की खूबसूरती और जीने की इच्छा को बयां कर रहे थे। डॉक्टर कपूर ने उन्हें संभालने का प्रयास किया और कमरे में भारी हड़कंप मच गया। उनका ड्राइवर अनवर तुरंत वहां पहुंचा और उनके नश्वर शरीर को उठाकर वापस उनके घर ले आया। रात का समय था और इंडस्ट्री में धीरे धीरे इस दुखद निधन की खबर फैलने लगी थी। जावेद अख्तर को जैसे ही इस अनहोनी की सूचना मिली वह तुरंत दौड़ते हुए सबसे पहले वहां पहुंचे।
कफन के पैसों से पूरा हुआ साहिर का पुराना वादा
आधी रात बीत जाने के बाद भी जावेद अख्तर अपने गुरु के पार्थिव शरीर के पास ही बैठे रहे और लगातार फफक कर रोते रहे। धीरे धीरे फिल्म जगत के तमाम कलाकारों और प्रशंसकों का हुजूम उनके निवास स्थान की ओर उमड़ने लगा। अगले दिन एक बड़ी भीड़ के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई और उन्हें सुपुर्द एक खाक किया जाने लगा। एक बेटे का फर्ज निभाते हुए जावेद उस पूरी प्रक्रिया में मौजूद रहे और अंतिम विदाई दी। जब सभी लोग कब्रिस्तान से वापस लौटने लगे और जावेद भी आगे बढ़ने लगे तभी पीछे से एक आवाज गूंजी। उर्दू लेखिका वाजिदा तबस्सुम के पति अशफाक ने उन्हें पुकारा और पूछा कि क्या उनके पास कुछ पैसे हैं। अशफाक ने बताया कि वह जल्दी में अपना बटुआ घर ही भूल आए हैं और कफन के लिए पैसों की जरूरत है। जावेद ने पूछा कि कितनी राशि चाहिए तो अशफाक ने दो सौ रुपए बताए। यह सुनते ही जावेद के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह पूरी तरह सन्न रह गए। यह वही दो सौ रुपए थे जो बरसों पहले साहिर ने उन्हें दिए थे और हमेशा मजाक में वापस मांगने की बात कहते थे। अपने गुरु का वह वादा इस तरह पूरा हुआ जिसे सोचकर जावेद आज भी उनकी कब्र पर खूब रोते हैं और पुरानी यादों में खो जाते हैं।