दक्षिण भारतीय फिल्मों और कलाकारों को लेकर भारतीय सिनेमा जगत में इन दिनों शब्दों के चयन और उनकी मार्केटिंग रणनीतियों पर तीखी बहस छिड़ गई है। इसी क्रम में टॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता नानी ने एक मंच पर खुलकर इस बात पर आपत्ति जताई कि केवल दक्षिणी सिनेमा की कृतियों को ही विशेष रूप से 'पैन-इंडिया' के तमगे से क्यों नवाजा जाता है, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में बड़े पैमाने पर रिलीज होने वाली बहुचर्चित हिंदी फिल्मों के साथ ऐसा विशेष वर्गीकरण नहीं किया जाता है। उन्होंने विशेष तौर पर बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्मों जैसे 'पठान' और 'जवान' का हवाला देते हुए पूछा कि यदि इन विशाल व्यावसायिक फिल्मों को पूरे देश में व्यापक स्तर पर रिलीज होने के बावजूद पैन-इंडिया नहीं कहा जाता है, तो फिर यही पैमाना दक्षिण की फिल्मों के साथ ही क्यों जोड़ा जाता है।
इस तरह का मुद्दा ऐसे समय में उठा है जब भारतीय फिल्म उद्योग में भाषा की दीवारें काफी हद तक गिर चुकी हैं और दक्षिण तथा उत्तर की फिल्में एक-दूसरे के बाजारों में भारी सफलता हासिल कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में बाहुबली, केजीएफ, पुष्पा और आरआरआर जैसी दक्षिण भारतीय फिल्मों ने हिंदी बेल्ट में बॉक्स ऑफिस के कई बड़े रिकॉर्ड तोड़े हैं, जिसके बाद से फिल्म वितरकों और मीडिया द्वारा इन सभी प्रोजेक्ट्स के लिए 'पैन-इंडिया' शब्द का इस्तेमाल एक आम चलन बन गया है। हालांकि, कई कलाकारों और फिल्म निर्माताओं का मानना है कि इस तरह के शब्दों का प्रयोग अब एक मार्केटिंग हथकंडा बनकर रह गया है जो सिनेमा को क्षेत्रीय खानों में बांटने का काम करता है, जबकि आज के समय में हर अच्छी फिल्म पूरे देश के दर्शकों के लिए होती है और उसे किसी खास क्षेत्रीय तमगे की जरूरत नहीं होती है।
अभिनेता नानी की इस तीखी टिप्पणी के बाद मनोरंजन गलियारों में और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जहां दर्शक और इंडस्ट्री के विशेषज्ञ इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या अब भारतीय सिनेमा को क्षेत्रीय या राष्ट्रीय जैसे शब्दों से परे देखकर केवल एक एकल राष्ट्रीय सिनेमा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आने वाले समय में जब भी कोई बड़ी फिल्म रिलीज होगी, तो इस प्रकार के मार्केटिंग टैग्स के इस्तेमाल पर फिल्म निर्माताओं और समीक्षकों द्वारा अधिक सावधानी बरती जा सकती है। यह बयान इस बात का भी प्रतीक है कि दक्षिण और उत्तर के कलाकारों के बीच अब उद्योगों की सीमाओं को पूरी तरह से मिटाकर एक एकीकृत भारतीय फिल्म बाजार के निर्माण की सोच और अधिक मजबूत होती जा रही है।