धार्मिक उत्सव और मंचन की शुरुआत
वर्तमान समय में तकनीक और इंटरनेट का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है लेकिन इसके बावजूद रानी बड़ौद में एक पुरानी धार्मिक नाट्य मंचन की परंपरा आज भी पूरी मजबूती से कायम है। यह ऐतिहासिक आयोजन पूरे एक सौ तिहत्तर साल पुराना है जो हर साल बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न होता है। इस सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत हर साल दशहरे के पवित्र दिन से होती है जब सबसे पहले अंबे माता की पावन ज्योत प्रज्ज्वलित की जाती है। ज्योत प्रज्वलन के साथ ही क्षेत्र में कई दिनों तक चलने वाले उत्सव का श्रीगणेश हो जाता है। इसके ठीक बाद एकादशी तिथि से धार्मिक नाटकों और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला अनवरत रूप से शुरू हो जाता है। इस पूरे आयोजन को सफल बनाने और आगे बढ़ाने में अंबिका नाट्य कला मंडल की भूमिका सबसे अहम रहती है जिसके माध्यम से हर साल यह भव्य आयोजन किया जाता है। रानी बड़ौद के स्थानीय निवासी और आसपास के विभिन्न गांवों से आने वाले लोग इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। नाटकों का मंचन देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ जुटती है और लोग माता के दरबार में पहुंचकर दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं।
कलाकारों की भूमिका और प्रस्तुतियां
इस पारंपरिक मंचन की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि इसमें बाहर के कलाकारों की जगह पूरी तरह से स्थानीय कलाकार ही अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। ये कलाकार अपने सजीव अभिनय और बेहतरीन संवाद अदायगी के जरिए पौराणिक और धार्मिक प्रसंगों को मंच पर बिल्कुल जीवंत कर देते हैं। उनकी प्रभावशाली कलाकारी को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और मंच पर उकेरे गए प्रसंग जीवंत प्रतीत होने लगते हैं। इन सभी धार्मिक नाटकों के माध्यम से दर्शकों को अपनी पुरानी धार्मिक मान्यताओं और महत्वपूर्ण नैतिक मूल्यों से गहराई से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। इसके अलावा कार्यक्रम में आने वाले दर्शकों का मनोरंजन बढ़ाने के लिए अन्य प्रस्तुतियां भी शामिल की जाती हैं। इस कड़ी में बिछड़ोद से विशेष रूप से आई एक डांस पार्टी भी मंच पर अपनी रंगारंग प्रस्तुतियां देती है जो दर्शकों का मन मोह लेती हैं। इस पूरे और बड़े आयोजन का संचालन करने में कई लोग अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं देते हैं। इन सहयोगियों में आनंदीलाल शर्मा के साथ चंद्र बंधु और दिलीप सिंह मेवाड़ा तथा राजमल शर्मा जैसे कई अन्य समर्पित व्यक्ति शामिल हैं जो अपनी देखरेख में सभी गतिविधियों को सुचारू रूप से पूरा करवाते हैं।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
आज के इस दौर में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन हर हाथ में पहुंच चुके हैं तब भी इस प्रकार के आयोजन अपनी माटी की खुशबू को बचाए हुए हैं। अंबिका नाट्य कला मंडल के बैनर तले आयोजित होने वाला यह सांस्कृतिक अनुष्ठान केवल एक धार्मिक उत्सव मात्र नहीं है। यह हमारे क्षेत्र की प्राचीन लोककला और पारंपरिक रंगमंच के साथ-साथ हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। ऐसे आयोजनों के जरिए नई पीढ़ी को अपनी भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों से रूबरू होने का बहुत ही सुंदर अवसर मिलता है। नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की इन प्रस्तुतियों से समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और लोग अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़े रहते हैं। आयोजकों और स्थानीय सहयोगियों की मेहनत का ही परिणाम है कि यह डेढ़ सदी से भी पुरानी परंपरा आज भी पूरी शान के साथ आगे बढ़ रही है। रानी बड़ौद और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोग इस विरासत को संभालने में पूरा सहयोग देते हैं जिससे यह आयोजन हर साल और अधिक भव्य रूप में सामने आता है।