सिनेमा के पर्दे पर पहली बार उतरी लोक आस्था भारतीय मनोरंजन जगत के विस्तृत फलक पर जब कभी क्षेत्रीय संस्कृति और लोक परंपराओं के समावेश की बात होती है, तो कई अनछुए पहलू सामने आते हैं। एक खास दौर में जब हिंदी सिनेमा मुख्यधारा के शहरी विषयों से आगे बढ़कर अपनी मिट्टी से जुड़ने का प्रयास कर रहा था, तब पहली बार सेल्युलाइड पर छठ पूजा के दृश्यों को अत्यंत सजीवता के साथ फिल्माया गया था। इस अभूतपूर्व दृश्य में बांस के सूप, ताजे नारियल और ठेकुए जैसे पारंपरिक पूजन सामग्रियों को बड़े ही करीने से पर्दे पर सजाया गया था, जिसने दर्शकों को सीधे तौर पर ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक थाती से जोड़ दिया था। इस पूरी परिकल्पना को मूर्तरूप देने में फिल्म से जुड़े कलाकारों और तकनीकविदों ने काफी मेहनत की थी ताकि लोक पर्व की पवित्रता और उसकी मूल भावना में किसी प्रकार की कमी न आए। आधुनिक तकनीकों और चमक-धमक से दूर उस दौर के सिनेमा ने इस अनूठे अनुष्ठान को बहुत ही प्रामाणिक और शालीन तरीके से प्रस्तुत किया था, जिसे आज भी भारतीय सिनेमाई इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।
उषा मंगेशकर की सुरीली आवाज और सांस्कृतिक जुड़ाव किसी भी दृश्य को उसकी आत्मा तक पहुँचाने में संगीत और गायन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, और इस ऐतिहासिक फिल्म के मामले में यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। प्रसिद्ध पार्श्व गायिका उषा मंगेशकर ने जब इस विशेष गीत को अपनी आवाज से संवारा, तो उसने पूरे दृश्य को एक अलग ही ऊंचाई पर पहुंचा दिया। उनकी आवाज में मौजूद वह ठेठ भारतीय मिठास और लोक धुनों की गहरी समझ ने उस गीत को अमर बना दिया, जो आज भी लोगों की जुबान पर किसी न किसी रूप में जिंदा है। मंगेशकर परिवार का भारतीय संगीत जगत में हमेशा से ही अप्रतिम योगदान रहा है और उन्होंने क्षेत्रीय व लोक संगीत को हमेशा मुख्यधारा में लाने का सराहनीय कार्य किया है। इस विशेष गीत के माध्यम से उन्होंने न केवल छठ के पारंपरिक लोकगीतों की आत्मा को छुआ, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सांस्कृतिक दस्तावेज छोड़ दिया जिस पर आज भी देश भर के संगीतप्रेमी गर्व महसूस करते हैं। गीत के बोल, उसकी धुन और उषा जी की गायकी का वह मेल आज के दौर के संगीतकारों के लिए भी एक बेहतरीन प्रेरणा का स्रोत है।
लोक संस्कृति के प्रसार और वर्तमान प्रभाव समय के साथ भारतीय सिनेमा और मनोरंजन माध्यमों में काफी बदलाव आए हैं, लेकिन पारंपरिक पर्वों और लोक संस्कृति की जड़ें आज भी उतनी ही गहरी हैं जितनी पहले हुआ करती थीं। जब कभी पुरानी फिल्मों के इन दुर्लभ दृश्यों और गानों को याद किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्रीय संस्कृति को मुख्यधारा के फलक पर लाने के प्रयास कितने दूरगामी परिणाम देते हैं। आज के आधुनिक दौर में जहां हर पर्व को एक बड़े पैमाने पर वैश्विक पहचान मिल रही है, वहीं शुरुआती दौर के ऐसे सिनेमाई प्रयोगों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है जिन्होंने उस समय समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। फिल्म इतिहासकारों और संस्कृतिविदों का मानना है कि इस प्रकार के क्लासिक कार्य आने वाले समय में नई पीढ़ी के रचनाकारों को अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाए रखेंगे। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया कि जब कला और संस्कृति आपस में मिलती हैं, तो वह समाज में एक सकारात्मक और स्थायी छाप छोड़ जाती हैं जो पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहती है।