भारतीय सिनेमा के इतिहास में नब्बे का दशक एक ऐसा स्वर्णिम काल माना जाता है, जब संगीत उद्योग में प्रयोगों के साथ-साथ मेलोडी और अर्थपूर्ण शब्दों का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता था। इसी दौर में एक ऐसी फिल्म आई थी जिसके एक बेहद खास और रोमांटिक गीत ने दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी थी। इस खूबसूरत गाने के बोल किसी और ने नहीं बल्कि उर्दू अदब के महान हस्ताक्षर और प्रख्यात शायर राहत इंदौरी ने रचे थे। उनकी कलम की ताकत और शब्दों का जादू इस गीत की हर एक पंक्ति में साफ झलकता है। राहत इंदौरी ने अपनी शायरी के जरिए जिस गहराई और संवेदनशीलता को इस गाने में पिरोया, उसने इसे आम प्रेम गीतों से कहीं ऊपर उठा दिया और इसे एक क्लासिक का दर्जा दिला दिया।
इस गीत की लोकप्रियता में चार चांद लगाने का काम किया बॉलीवुड के डिस्को डांसर कहे जाने वाले गोविंदा और अभिनेत्री करिश्मा कपूर की लोकप्रिय जोड़ी ने, जिन पर यह गाना परदे पर जीवंत हुआ था। परदे पर गोविंदा का अनूठा अंदाज और करिश्मा कपूर की दिलकश अदाएं जब राहत इंदौरी के लिखे गए इन जादुई शब्दों के साथ मिलती हैं, तो एक अलग ही जादू बिखर जाता है। इस बेहतरीन रचना को अपनी जादुई और रसीली आवाज से सजाने का काम किया था मशहूर पार्श्व गायक कुमार संजू ने। कुमार संजू की सुरीली और दिल को छू लेने वाली गायकी ने इस गीत में जान फूंक दी, जिससे यह गाना हर वर्ग के श्रोताओं के बीच तुरंत लोकप्रिय हो गया। उस समय सार्वजनिक परिवहन यानी बसों से लेकर नुक्कड़ की दुकानों तक, हर जगह यही कल्ट गाना गूंजता रहता था और लोग इसके संगीत में खो जाते थे।
दशकों बीत जाने के बाद भी आज के दौर में जब संगीत की दुनिया में काफी बदलाव आ चुका है, इस तरह के क्लासिक गीतों का जादू जरा भी फीका नहीं पड़ा है। आज भी जब लोग पुराने दौर के संगीत को याद करते हैं, तो राहत इंदौरी के लिखे और कुमार संजू द्वारा गाए गए इस गीत का जिक्र बड़े ही चाव से किया जाता है। यह गीत इस बात का प्रमाण है कि सच्चे अर्थों और सुरीली धुनों से सजे गाने कभी पुराने नहीं होते, बल्कि समय के साथ उनकी चमक और अधिक बढ़ जाती है। नई पीढ़ी के संगीत प्रेमियों के बीच भी इस कल्ट गाने की लोकप्रियता इस बात की गवाही देती है कि बेहतरीन कला हमेशा जीवित रहती है और आने वाले समय में भी श्रोताओं को यूं ही मंत्रमुग्ध करती रहेगी।