शूटिंग का पसंदीदा गंतव्य बना उत्तराखंड
उत्तराखंड में बड़े फिल्म बैनर और वेब सीरीज की लगातार हो रही शूटिंग ने राज्य की अर्थव्यवस्था और कला जगत को एक नई दिशा दी है। सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गई फिल्म नीति के कारण यह प्रदेश अब फिल्म निर्माताओं के लिए पहली पसंद बनता जा रहा है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ सुदृढ़ हवाई और सड़क संपर्क ने निर्माताओं का काम आसान कर दिया है। इसका सीधा असर पर्दे के पीछे काम करने वाले युवाओं पर पड़ा है, जिन्हें अभिनय, मेकअप, कैमरा संचालन और लाइन प्रोडक्शन जैसे तकनीकी क्षेत्रों में अब अपने घर के पास ही रोजगार प्राप्त हो रहा है। पहले जो कलाकार काम की तलाश में मुंबई जाने को विवश थे, उन्हें अब देवभूमि में ही बेहतर अवसर मिलने लगे हैं। हिंदी फिल्मों के अलावा, अन्य भाषाओं की फिल्मों के निर्माण से भी राज्य का फिल्म उद्योग एक बड़ी छलांग लगा रहा है। स्थानीय स्तर पर हो रहे फिल्म निर्माण से न केवल पलायन पर रोक लग रही है, बल्कि राज्य की छिपी हुई प्रतिभाओं को भी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने का मौका मिल रहा है।
सब्सिडी नीति से फिल्म उद्योग को मिली ऊर्जा
फिल्म निर्माताओं को उत्तराखंड की ओर आकर्षित करने में राज्य सरकार की आकर्षक सब्सिडी नीति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। नीति के प्रावधानों के अनुसार, हिंदी और संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित भाषाओं की फिल्मों को राज्य में किए गए कुल खर्च का 30 प्रतिशत या अधिकतम तीन करोड़ रुपये तक का अनुदान प्रदान किया जा रहा है। वहीं, स्थानीय भाषा की फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए 50 प्रतिशत तक सब्सिडी देने का बड़ा निर्णय लिया गया है। इस आर्थिक सहयोग से क्षेत्रीय फिल्म उद्योग में एक नई क्रांति आई है। अभिनेत्री रूप दुर्गापाल का कहना है कि शूटिंग के लगातार होने वाले आयोजन स्थानीय कलाकारों के लिए एक वरदान साबित हो रहे हैं। एक फिल्म के निर्माण से प्रत्यक्ष रूप से करीब 50 से 60 लोगों को रोजगार मिलता है, जो राज्य के युवाओं के लिए आय का बड़ा जरिया बन गया है। अब जल्द ही यहां तेलुगु और पंजाबी फिल्मों की भी शूटिंग शुरू होने वाली है, जो राज्य की फिल्म इंडस्ट्री की बदलती तस्वीर को दर्शाती है।
स्थानीय सिनेमा में तेजी से सुधार और भविष्य
राज्य में स्थानीय सिनेमा का ग्राफ 14 मार्च 2024 को फिल्म सब्सिडी नीति लागू होने के बाद तेजी से ऊपर गया है। निर्देशक देबू रावत के अनुसार, 2019 में 'कन्यादान' और 2021 में 'ठोकदार' जैसी सीमित फिल्में बनी थीं, लेकिन अब परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। साल 2025 में ही 15 क्षेत्रीय फिल्में बनकर तैयार हुईं और इस वर्ष के शुरुआती महीनों में ही पांच फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। इस साल कुल 20 स्थानीय फिल्मों के पर्दे पर आने की उम्मीद जताई जा रही है, जो कि बीते वर्षों की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक है। 'जोना' और 'घपरोल' जैसी फिल्मों में नए निर्देशकों और कलाकारों को मिल रहे मौके यह साबित करते हैं कि उत्तराखंड की युवा प्रतिभाएं अब मुख्यधारा में शामिल हो रही हैं। निरंतर हो रहे फिल्म निर्माण कार्यों से तकनीशियनों की मांग बढ़ी है, जिससे राज्य में पेशेवर माहौल बन रहा है। आगामी समय में भी इस नीति के और अधिक सकारात्मक परिणाम मिलने की पूरी संभावना है, जिससे क्षेत्रीय सिनेमा एक मजबूत पहचान बना सकेगा।