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बढ़ता खतरा: हिमाचल प्रदेश में चार साल के भीतर ग्लेशियर झीलों की संख्या बढ़कर हुई 2,292

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार पिछले चार वर्षों में राज्य में ग्लेशियरों से जुड़ी झीलों की संख्या में भारी उछाल दर्ज किया गया है।

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Ankit Yadav
30 अग 2026, 14:08
बढ़ता खतरा: हिमाचल प्रदेश में चार साल के भीतर ग्लेशियर झीलों की संख्या बढ़कर हुई 2,292
हिमाचल प्रदेश के पर्यावरण और प्राकृतिक भौगोलिक संरचना को लेकर एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। राज्य के विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित ग्लेशियरों पर लगातार मंडरा रहे खतरे के बीच यह पता चला है कि पिछले चार वर्षों के अल्पकाल में ही ग्लेशियर झीलों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हुई है। आधिकारिक तौर पर सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, जो झीलें पहले केवल 1,359 की संख्या में थीं, वे अब बढ़कर 2,292 के आंकड़े को पार कर चुकी हैं। इस प्रकार की तीव्र वृद्धि पर्यावरणविदों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गई है।

तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का असर

जलवायु परिवर्तन का सीधा असर हिमालयी क्षेत्रों के तापमान पर पड़ रहा है, जिसके कारण पहाड़ों पर जमी बर्फ और ग्लेशियर अत्यधिक तीव्र गति से पिघल रहे हैं। जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो उनके निचले हिस्सों में बड़े पैमाने पर पानी जमा होने लगता है, जिससे नई झीलों का निर्माण होता है या पुरानी झीलों का आकार लगातार बड़ा हो जाता है। इस स्थिति को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ के खतरे के रूप में देखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तापमान वृद्धि की यह रफ्तार इसी प्रकार जारी रही, तो आने वाले समय में पहाड़ी ढलानों पर ऐसी कई और खतरनाक झीलें आकार ले सकती हैं जो निचले इलाकों में रहने वाली आबादी के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि इस तरह की अप्रत्याशित वृद्धि से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लगातार पिघलते हिमखंड न केवल जल स्रोतों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं, बल्कि पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं की आशंका को भी कई गुना बढ़ा रहे हैं। राज्य के जल संसाधनों और भौगोलिक स्थिति पर अध्ययन करने वाले अनुसंधानकर्ता इन जल निकायों के आकार और उनकी संवेदनशीलता पर पैनी नजर बनाए हुए हैं ताकि समय रहते आवश्यक सावधानियां बरती जा सकें।

आगामी सुरक्षा कदम और प्रशासनिक सतर्कता

इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद अब स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पूरी तरह से सतर्क हो गए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने के लिए विशेष निगरानी दल गठित किए जा रहे हैं ताकि उन झीलों पर विशेष ध्यान दिया जा सके जो आकार में बहुत बड़ी हो चुकी हैं और जिनके टूटने का जोखिम अधिक है। सरकार की ओर से ऐसे दुर्गम इलाकों में वैज्ञानिक सर्वेक्षण और रिमोट सेंसिंग तकनीकों की मदद लेने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि किसी भी संभावित आपदा से पहले चेतावनी प्रणालियों को मजबूत किया जा सके और समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें।
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