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बौद्धिक तकरार: एसआरसीसी में 'दिमागी नक्सल' बयान पर तीखा विवाद, CJP ने प्रधानमंत्री पर साधा निशाना
दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में 'दिमागी नक्सल' को लेकर शुरू हुए विवाद पर सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) ने कड़ी आपत्ति जताई है। संगठन ने युवाओं पर ऐसे लेबल लगाने के बजाय उन्हें सकारात्मक उम्मीदें देने की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है।
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Ankit Yadav
06 सित 2026, 16:52
राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) के मंच से हाल ही में उभरे 'दिमागी नक्सल' शब्द ने देश भर के शैक्षणिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद से ही विभिन्न सामाजिक संगठन और राजनीतिक हस्तियां अपनी प्रतिक्रियाएं दे रही हैं। इसी कड़ी में सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) ने इस शब्दावली के प्रयोग पर गहरी नाराजगी जाहिर की है और इसे देश के युवाओं के भविष्य के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण करार दिया है।
युवाओं को लेबल देने के बजाय अवसर देने की जरूरत
संगठन के प्रतिनिधियों का कहना है कि आज देश का युवा वर्ग अपनी मेहनत, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता के दम पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में शिक्षण संस्थानों के मंचों से इस तरह की वैचारिक शब्दावली का इस्तेमाल करना और विद्यार्थियों पर तरह-तरह के ठप्पा लगाना पूरी तरह से अनुचित है। CJP का तर्क है कि शैक्षणिक परिसरों का उद्देश्य छात्रों को वैचारिक रूप से स्वतंत्र बनाना और उनके भीतर आलोचनात्मक सोच को विकसित करना होना चाहिए, न कि उन्हें किसी राजनीतिक या वैचारिक खांचे में फिट करके हतोत्साहित करना। युवाओं को समर्थन और सशक्तिकरण की आवश्यकता है, न कि ऐसे नकारात्मक लेबलों की जो उनके आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाएं।
प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा निशाना और बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी
इस पूरे प्रकरण के दौरान CJP ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी सीधा निशाना साधा। संगठन का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर इस प्रकार की भाषा और बयानों से समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचता है। एसआरसीसी जैसी जगहों पर होने वाली ऐसी चर्चाएं अमूमन अकादमिक जगत से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ जाती हैं, जिससे सत्तारूढ़ दल और विपक्षी संगठनों या नागरिक समूहों के बीच वैचारिक संघर्ष और अधिक तीव्र हो जाता है।
आगामी दिनों में और तेज हो सकती है वैचारिक बहस
जैसे-जैसे यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है, यह अंदेशा जताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में देश के अन्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी इस विषय पर सेमिनार, विरोध प्रदर्शन और बैठकों का दौर शुरू हो सकता है। विभिन्न छात्र संगठनों ने भी इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रखनी शुरू कर दी है, जिससे शैक्षणिक परिसरों का माहौल एक बार फिर गरमा गया है। यह विवाद यह सोचने पर मजबूर करता है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में वैचारिक स्वतंत्रता और राजनीतिक बयानबाजी के बीच की रेखा किस प्रकार खींची जानी चाहिए।