निशानेबाजी में पदकों की भारी निराशा
एशियन गेम्स के इस बड़े महाकुंभ में भारतीय निशानेबाजों से देश को बहुत अधिक उम्मीदें थीं। प्रतियोगिता के शुरुआती दिनों से ही उम्मीद जताई जा रही थी कि निशानेबाजी रेंज में भारतीय खिलाड़ी कई स्वर्ण और अन्य पदक अपने नाम करेंगे। लेकिन खेल के मैदान पर स्थिति पूरी तरह उलट नजर आई और देश के शीर्ष निशानेबाज उम्मीदों पर खरे उतरने में नाकामयाब रहे। कई स्पर्धाओं में पदक के प्रबल दावेदार माने जाने वाले एथलीट फाइनल राउंड में ही पिछड़ गए और मामूली अंतर से चूक गए। क्वालीफिकेशन राउंड पार करने के बाद निर्णायक मुकाबलों में खिलाड़ियों का प्रदर्शन लगातार दबाव के कारण लड़खड़ा गया। इस अप्रत्याशित नाकामी से खेल प्रेमियों और खेल संघ के अधिकारियों को बहुत बड़ा झटका लगा है। निशानेबाजी दल के इस लचर प्रदर्शन ने भारत की कुल पदक तालिका को भी गहरा नुकसान पहुंचाया है। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करने वाले हमारे निशानेबाज इस बार अपनी लय पूरी तरह से खो बैठे थे। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर पर मानसिक दबाव को न झेल पाना इस बड़ी असफलता का मुख्य कारण बना है।
हॉकी और क्रिकेट का शानदार प्रदर्शन
निशानेबाजी में मिली गहरी निराशा के बाद देश के लोकप्रिय खेल मैदानों से बेहद राहत भरी और उत्साहजनक खबरें सामने आईं। भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों ने अपनी बेहतरीन स्टिक वर्क और अद्भुत रणनीतिक खेल से मैदान पर जलवा बिखेरा। हॉकी के खिलाड़ियों ने अपने सभी मुकाबलों में जबर्दस्त तालमेल दिखाया और विपक्षी टीमों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। इसके साथ ही क्रिकेट के मैदान पर भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी पारंपरिक और आक्रामक शैली का शानदार परिचय दिया। टी-20 और अन्य प्रारूपों के मैचों में बल्लेबाजों और गेंदबाजों दोनों ने ही अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए लगातार जीत दर्ज की। तीरंदाजी के मैदान पर भी हमारे तीरंदाजों ने सटीक निशाने साधते हुए कई महत्वपूर्ण मुकाबले अपने नाम किए और पोडियम पर अपनी जगह पक्की की। इन तीनों प्रमुख खेलों के सामूहिक और साहसिक प्रदर्शन ने देश की पदक तालिका को संभालने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। खिलाड़ियों की इस प्रतिबद्धता और संघर्षशीलता ने निराश हो चुके भारतीय खेल जगत में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया है। टीम के सभी सदस्यों ने कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानने की अपनी पुरानी आदत को एक बार फिर से साबित करके दिखाया है।
चौथा स्थान और भविष्य की चुनौतियां
विभिन्न खेल स्पर्धाओं में हुए इन उतार-चढ़ाव भरे मुकाबलों के बाद भारत एशियन गेम्स की पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा है। यह स्थान अपने आप में देश के लिए एक सम्मानजनक उपलब्धि है लेकिन यह हमें उन कमियों की भी याद दिलाता है जिन्हें दूर करना जरूरी है। एशियाई खेलों का यह मंच हमेशा से ही एशियाई महाद्वीप के सबसे बेहतरीन एथलीटों की कड़ी परीक्षा लेता आया है। चौथे स्थान पर रहने का यह परिणाम हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिन खेलों में हमारे एथलीट पिछड़ गए वहां क्या सुधार करने की आवश्यकता है। खेल मंत्रालय और विभिन्न राष्ट्रीय खेल महासंघों को अब मिलकर एक लंबी और ठोस रणनीति तैयार करनी होगी। विशेषकर निशानेबाजी जैसी विधाओं में जहां पदक की सबसे ज्यादा उम्मीदें रहती हैं, वहां प्रशिक्षण की आधुनिक पद्धतियों को अपनाना होगा। खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य और बड़े मुकाबलों के दौरान दबाव से निपटने के कौशल पर विशेष रूप से ध्यान देने की बेहद जरूरत है। इस चौथे स्थान के संतोषजनक परिणाम को आधार बनाकर हमें आने वाले ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ताकि देश का नाम और अधिक ऊंचाई तक पहुंच सके।