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खेल मैदानों का संकट: देहरादून में एक दर्जन से घटकर सिर्फ एक मैदान बचा
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में खेल मैदानों की स्थिति बेहद दयनीय होती जा रही है, जहां कभी एक दर्जन से अधिक मैदान हुआ करते थे, वहीं अब बमुश्किल एक या दो ही बचे हैं और वहां भी खेलकूद की गतिविधियां चलाना असंभव सा हो गया है।
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Ankit Yadav
15 सित 2026, 15:25
उत्तराखंड के प्रमुख शहर देहरादून में खेलकूद और युवा प्रतिभाओं के विकास के लिए बुनियादी ढांचे की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। शहर के भीतर खेल प्रेमियों और स्थानीय निवासियों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि बच्चों और युवाओं के खेलने के लिए अब सुरक्षित और उपयुक्त स्थान लगभग समाप्त हो चुके हैं। स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि प्रशासनिक लापरवाही और अनियोजित शहरीकरण के कारण खेल के मैदानों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।
घटते खेल मैदान और बदहाल बुनियादी ढांचा
बच्चों के शारीरिक विकास और खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खेल के मैदानों का होना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि, देहरादून का हालिया परिदृश्य इस बात का गवाह है कि कैसे एक के बाद एक सार्वजनिक मैदान गायब होते चले गए। अतीत के पन्नों को पलटें तो शहर के विभिन्न इलाकों में लगभग एक दर्जन से अधिक सक्रिय खेल मैदान हुआ करते थे, जहां स्थानीय टूर्नामेंट, अभ्यास सत्र और बच्चे रोजाना खेलकूद का आनंद लेते थे। लेकिन आज के समय में स्थिति यह है कि कुल मिलाकर बमुश्किल एक या एकाध मैदान ही बचा-खुचा नजर आता है।
खेलने के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त बचे मैदान
केवल मैदानों की संख्या में भारी गिरावट ही एकमात्र समस्या नहीं है, बल्कि जो इक्का-दुक्का मैदान अभी किसी तरह बचे भी हुए हैं, उनकी हालत भी खेल के अनुकूल नहीं बची है। रखरखाव के अभाव, अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता के कारण इन शेष स्थानों पर भी खेल गतिविधियां आयोजित करना मुनासिब नहीं रह गया है। मैदानों की जमीन पर अवैध कब्जे, झाड़ियों का उगना, और उचित देखरेख न होने से युवा खिलाड़ी और खेल प्रेमी निराश होने लगे हैं। इस स्थिति के कारण उभरती हुई खेल प्रतिभाओं को अपने कौशल को निखारने का अवसर नहीं मिल पा रहा है।
प्रशासनिक उदासीनता और भविष्य की चिंताएं
स्थानीय लोगों और खेल प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले समय में देहरादून से खेल संस्कृति पूरी तरह विलुप्त हो जाएगी। शहर के जिम्मेदार विभागों और स्थानीय प्रशासन को इस गंभीर मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए ताकि बचे हुए मैदानों का पुनरुद्धार किया जा सके और नए खेल परिसरों का निर्माण हो सके। युवाओं के सुनहरे भविष्य और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए खेल मैदानों की सुरक्षा और उनका सुदृढ़ीकरण अब एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है, जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की सख्त जरूरत है।