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खेल संस्थाओं पर शिकंजा: सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को लेकर पूछा नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट क्यों नहीं लागू होना चाहिए

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई पर प्रशासनिक नियमों का दायरा बढ़ाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा सवाल उठाया है कि आखिर नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 को इस देश की सबसे अमीर क्रिकेट संस्था पर क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिए।

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Ankit Yadav
10 सित 2026, 12:24
खेल संस्थाओं पर शिकंजा: सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई को लेकर पूछा नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट क्यों नहीं लागू होना चाहिए
भारतीय खेलों की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से अदालतों और नीति निर्माताओं का रुख लगातार कड़ा होता जा रहा है। इसी कड़ी में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से एक ऐसा गंभीर और विचारणीय प्रश्न सामने आया है, जिसने खेल गलियारों में खलबली मचा दी है। अदालत ने सीधे तौर पर यह जानना चाहा है कि नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 के प्रावधानों को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पर अमल में क्यों न लाया जाए। इस तरह के कानूनी और प्रशासनिक शिकंजे से देश भर के खेल प्रेमियों के साथ-साथ लखनऊ जैसे प्रमुख उत्तर भारतीय शहरों के खेल अकादमियों और स्थानीय क्रिकेट प्रेमियों में भी चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है कि क्या अब क्रिकेट प्रशासन के ढांचे में भी बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे।

कानूनी शिकंजा और प्रशासनिक पारदर्शिता

देश की शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी के बाद खेल प्रशासन से जुड़े तमाम दिग्गजों की नींद उड़ सकती है। अमूमन यह माना जाता रहा है कि क्रिकेट अन्य खेलों की तुलना में एक अलग और स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करता है, लेकिन जिस प्रकार से कानूनों के दायरे में सभी को लाने की बात हो रही है, उससे खेल संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लाजिमी हैं। जानकारों का मानना है कि यदि इस तरह के नए और आधुनिक विधानों को पूरी तरह से लागू किया जाता है, तो वित्तीय प्रबंधन से लेकर चयन और आंतरिक चुनावों तक हर स्तर पर पारदर्शिता की एक नई सुबह देखने को मिल सकती है। लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम या अन्य स्थानीय खेल संगठनों से जुड़े प्रशासक भी इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि शीर्ष अदालत का यह रुख आने वाले दिनों में क्या बड़ा मोड़ लेगा। भविष्य की रणनीतियों और कानूनी औपचारिकताओं को देखें तो आने वाले हफ्तों में इस मामले की सुनवाई के दौरान कई बड़े खुलासे और पक्ष सामने आने की पूरी संभावना है। बीसीसीआई के कानूनी सलाहकारों को इस गंभीर सवाल का संतोषजनक जवाब तैयार करना होगा कि इस नए एक्ट से उन्हें क्यों अलग रखा जाना चाहिए या फिर इसके दायरे में आने से संस्था को किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आम जनता और खेल विश्लेषक इस बात का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि क्या क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेल को भी पूरी तरह से राष्ट्रीय खेल संहिता के दायरे में लाया जाएगा या नहीं। लखनऊ के खेलप्रेमियों के बीच भी यह चर्चा का मुख्य विषय बन चुका है कि आने वाले समय में खेल प्रशासन का स्वरूप किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
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