भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज सुबह ठीक 10:30 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से एलवीएम3-एम5 रॉकेट के जरिए चंद्रयान-4 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस महत्वाकांक्षी मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के उस दुर्गम क्षेत्र से वैज्ञानिक नमूने एकत्र करना है जहाँ सूर्य की किरणें सीधे नहीं पहुँचती हैं। इस प्रक्षेपण को देखने के लिए देश भर के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष प्रेमियों में भारी उत्साह देखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसरो के वैज्ञानिकों को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर बधाई दी है और इसे भारत के अंतरिक्ष विज्ञान के लिए एक बड़ी छलांग बताया है।
चंद्रयान-4 की तकनीकी विशेषताएं और लैंडिंग मॉड्यूल इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया यह नया मिशन पिछले चंद्र मिशनों की तुलना में काफी उन्नत और जटिल है। इस बार अंतरिक्ष यान में चार अलग-अलग मॉड्यूल शामिल किए गए हैं - प्रोपल्शन मॉड्यूल, लैंडर मॉड्यूल, एसेन्डर मॉड्यूल और रिटर्नर मॉड्यूल। चंद्रमा की कक्षा में पहुँचने के बाद, लैंडर मॉड्यूल सफलतापूर्वक दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा, जहाँ से एसेन्डर मॉड्यूल नमूनों को लेकर वापस चंद्रमा की कक्षा में स्थापित होगा और अंत में रिटर्नर मॉड्यूल उन नमूनों को सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में अत्याधुनिक रोबोटिक आर्म्स और स्वचालित नेविगेशन सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है, जिसे पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है।
वैश्विक स्तर पर भारत की अंतरिक्ष कूटनीति चंद्रयान-4 की इस सफल उड़ान ने वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में भारत की स्थिति को और अधिक मजबूत कर दिया है। कई प्रमुख देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां इस मिशन पर बारीकी से नजर रख रही हैं क्योंकि चंद्रमा से सुरक्षित नमूना वापसी की तकनीक अभी तक केवल कुछ ही देशों के पास है। इसरो के अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने बताया कि इस मिशन के माध्यम से भारत न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान में अग्रणी बनेगा बल्कि भविष्य के मानवयुक्त चंद्र अभियानों (गगनयान) के लिए भी मार्ग प्रशस्त करेगा। आने वाले महीनों में यह यान चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करेगा और वैज्ञानिक समुदाय इस मिशन से मिलने वाले अमूल्य डेटा को लेकर बेहद उत्साहित है।