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टेक्नोलॉजी

बायो-डाइजेस्टर तकनीक: सियाचिन के बाद अब रेलवे और आम घरों में होगी DRDO की इस तकनीक की एंट्री

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ (DRDO) की पर्यावरण-अनुकूल बायो-डाइजेस्टर तकनीक का दायरा अब अत्यधिक ऊंचाई वाले बर्फीले क्षेत्रों और रेलवे के सफर से निकलकर सीधे आम नागरिकों के घरों तक पहुंच रहा है।

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Ankit Yadav
31 अग 2026, 10:45
बायो-डाइजेस्टर तकनीक: सियाचिन के बाद अब रेलवे और आम घरों में होगी DRDO की इस तकनीक की एंट्री
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित की गई बायो-डाइजेस्टर तकनीक ने पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है। शुरुआत में इस अत्याधुनिक तकनीक को मुख्य रूप से भारतीय सशस्त्र बलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था, ताकि सियाचिन जैसे अत्यधिक ठंडे और दुर्गम पर्वतीय इलाकों में तैनात हमारे सैनिकों को कचरा प्रबंधन और स्वच्छता संबंधी गंभीर समस्याओं से राहत मिल सके। इन बर्फीले और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मानव मल और अन्य जैविक कचरे का प्राकृतिक रूप से विघटन होना बेहद कठिन होता है, जिसके समाधान के रूप में इस अनूठी तकनीक ने एक क्रांतिकारी बदलाव लाकर दिखाया।

रेलवे से लेकर घरों तक विस्तार

सफलता के इन शुरुआती चरणों को पार करने के बाद, इस प्रणाली की उपयोगिता को समझते हुए इसका दायरा भारतीय रेलवे के नेटवर्क तक बढ़ाया गया। ट्रेनों में इस तकनीक के इस्तेमाल से पटरियों पर गंदगी फैलने की पुरानी और गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकाला गया, जिससे पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मदद मिली। अब इसी दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए, इस तकनीक को आम जनता के लिए आवासीय परिसरों और व्यक्तिगत घरों तक पहुंचाने की पुख्ता तैयारी कर ली गई है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में कचरे के सही प्रबंधन के लिए यह एक बेहद प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। इस नई और उन्नत प्रणाली की कीमत और इसकी आर्थिक खूबियों को लेकर भी लोगों में काफी उत्सुकता देखी जा रही है। जानकारों के अनुसार, आम घरों में इसकी स्थापना के लिए लागत को किफायती रखने का प्रयास किया जा रहा है ताकि मध्यम वर्ग के लोग भी इसे आसानी से अपना सकें। हालांकि इसकी सटीक कीमत इसके आकार और इंस्टॉलेशन की जरूरतों पर निर्भर करेगी, लेकिन लंबी अवधि में यह कचरा निपटान के पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी किफायती और टिकाऊ साबित होगी। सरकार और संबंधित विभाग इस तकनीक को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं भी तैयार कर रहे हैं। पर्यावरणविदों और शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों ने डीआरडीओ के इस कदम का जोरदार स्वागत किया है। उनका कहना है कि इस तरह की स्वदेशी तकनीकों के व्यापक प्रसार से न केवल हमारे शहरों और गांवों में स्वच्छता का स्तर सुधरेगा, बल्कि जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाने में भी बड़ी मदद मिलेगी। आने वाले समय में जैसे-जैसे यह तकनीक बड़े पैमाने पर आवासीय क्षेत्रों में स्थापित की जाएगी, वैसे-वैसे देश में अपशिष्ट प्रबंधन की पूरी रूपरेखा ही बदल जाने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
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