भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR), राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) और अग्रणी अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक संयुक्त और विस्तृत यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण (Randomized Controlled Trial) से बाल पोषण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण और राहत देने वाले निष्कर्ष सामने आए हैं। इस नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह निर्विवाद रूप से साबित हुआ है कि आयरन (लोह तत्व) और जिंक (जस्ता) जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से बायो-फोर्टिफाइड (bio-fortified) बाजरे के नियमित सेवन से छोटे बच्चों (toddlers) के पेट के स्वास्थ्य, आंतों के लाभदायक जीवाणुओं (gut microbiome) या पाचन तंत्र पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
विकासशील देशों में छोटे बच्चों के बीच एनीमिया (रक्तल्पता) और जिंक की कमी से होने वाले कुपोषण को दूर करने के लिए बायो-फोर्टिफाइड मोटे अनाजों (जैसे बाजरा और ज्वार) को आहार में शामिल करने की सिफारिश की जाती रही है। हालांकि, बाल रोग विशेषज्ञों के बीच यह एक चिंता का विषय बना हुआ था कि अतिरिक्त आयरन की मात्रा बच्चों की आंतों में सूजन या हानिकारक बैक्टीरिया की वृद्धि का कारण बन सकती है। वैज्ञानिकों ने 12 से 36 महीने के बच्चों पर छह महीने तक चले गहन नैदानिक परीक्षणों (clinical trials) और मल के नमूनों के डीएनए अनुक्रमण (DNA sequencing) के विश्लेषण के बाद पाया कि फोर्टिफाइड बाजरा खाने वाले बच्चों में लाभकारी बैक्टीरिया (Bifidobacterium) की संख्या बनी रही और उनकी आंतों की सेहत पूरी तरह सामान्य और सुरक्षित रही।
'सुपोषित भारत' और 'श्री अन्न' अभियान को मिलेगी नई ताकत
इस प्रतिष्ठित अध्ययन के निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल 'नेचर न्यूट्रिशन' में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैज्ञानिक प्रमाण भारत सरकार के 'मिशन सक्षम आंगनवाड़ी', 'पोषण अभियान' और 'मिड-डे मील' (PM POSHAN) योजनाओं में बाजरा आधारित पौष्टिक व्यंजनों को निर्भीक होकर शामिल करने के प्रयासों को बहुत बड़ी तकनीकी और scientific मजबूती प्रदान करेगा।
अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता ने बताया कि बायो-फोर्टिफाइड बाजरे के सेवन से बच्चों के हीमोग्लोबिन स्तर और शारीरिक विकास में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, बिना किसी पेट दर्द या दस्त जैसी समस्या के। भारत में मोटे अनाज यानी 'श्री अन्न' (Shree Anna) को बढ़ावा देने के वैश्विक अभियानों के बीच यह शोध रिपोर्ट पूरे दक्षिण एशिया और अफ्रीकी देशों में बाल कुपोषण को दूर करने की नीति निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी।