भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के निजीकरण और वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। हैदराबाद स्थित प्रमुख अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी स्टार्टअप 'स्काईरूट एयरोस्पेस' (Skyroot Aerospace) द्वारा पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित भारत के पहले बहु-स्तरीय 3D-प्रिंटेड रॉकेट 'विक्रम-1' (Vikram-1) ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलता पूर्वक अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी। उड़ान भरने के महज 11 मिनट बाद रॉकेट ने अपने साथ ले जाए गए तीन व्यावसायिक ग्राहक उपग्रहों (customer satellites) को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में पूरी सटीकता और निर्धारित गति के साथ स्थापित कर दिया।
विक्रम-1 एक अत्याधुनिक, हल्का और अत्यधिक सक्षम प्रक्षेपण यान है, जिसकी पूरी बॉडी उच्च शक्ति वाले कार्बन-फाइबर कंपोजिट से निर्मित है। इस रॉकेट में 3D-प्रिंटेड लिक्विड और सॉलिड प्रोपल्शन इंजन लगे हैं, जिन्हें भारतीय इंजीनियरों द्वारा इन-हाउस डिजाइन और निर्मित किया गया है। इस ऐतिहासिक सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत अब वैश्विक निजी छोटे उपग्रह प्रक्षेपण बाजार (Small Satellite Launch Market) में एक सबसे किफायती, सुरक्षित और विश्वसनीय केंद्र के रूप में अपनी धाक जमाने में सफल रहा है। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) और इसरो (ISRO) के शीर्ष वैज्ञानिकों ने इस पूरे मिशन की निगरानी की और इसे भारतीय मेधा की बड़ी जीत करार दिया।
वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में भारत की बढ़त
अंतरिक्ष विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि स्काईरूट एयरोस्पेस की इस अभूतपूर्व सफलता से दुनिया भर के वाणिज्यिक उपग्रह निर्माताओं के लिए भारत से उपग्रह छोड़ना अत्यधिक सस्ता और त्वरित हो जाएगा। स्काईरूट के सह-संस्थापकों ने प्रक्षेपण के बाद संवाददाताओं को बताया कि विक्रम-1 की इस सफल साबित हुई तकनीक के बल पर कंपनी अगले वित्तीय वर्ष से हर महीने कम से कम दो नियमित वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशनों को अंजाम देने का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसके लिए कई विदेशी कंपनियों के साथ अग्रिम समझौतों पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफलता पर स्काईरूट एयरोस्पेस की युवा टीम, इसरो और IN-SPACe को हार्दिक बधाई दी। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर लिखा कि विक्रम-1 का यह सफल प्रक्षेपण भारत के युवाओं के नवाचार, हमारी तकनीकी प्रगति और 'आत्मनिर्भर भारत' तथा 'मेक इन इंडिया' की संकल्पना का सबसे जीवंत उदाहरण है। इस मिशन की सफलता ने भारत के निजी स्पेस-टेक पारिस्थितिकी तंत्र में घरेलू और विदेशी निवेशकों के विश्वास को कई गुना बढ़ा दिया है।