Lucknow Desk : नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान हिमालय की ताकत और उसकी नाजुकता की ओर खींच दिया है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में बर्फ, चट्टान और मलबे के अचानक खिसकने के बाद नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ। पानी के रास्ते में बने अवरोध के पीछे दबाव बढ़ा और जब यह अवरोध टूटा तो पानी भारी मलबे के साथ तेजी से नीचे की ओर बह निकला। देखते ही देखते यह सामान्य नदी प्रवाह एक विनाशकारी फ्लैश फ्लड में बदल गया। घटना के शुरुआती दौर में क्षेत्र में दर्ज कंपन ने भूकंप जैसी आशंका पैदा की। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) से जुड़े प्रारंभिक विश्लेषणों में इस भूकंपीय गतिविधि और बड़े भूस्खलन या आइस-रॉक मूवमेंट के बीच संभावित संबंध की ओर संकेत किया गया। ऐसे में फिलहाल इस घटना को केवल भूकंप या सामान्य बाढ़ के तौर पर देखना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। पहाड़ का हिस्सा खिसकना, नदी का रास्ता बाधित होना और उसके बाद अचानक पानी व मलबे का नीचे की ओर बहना—इन सभी प्रक्रियाओं ने मिलकर आपदा को भयावह बनाया। 155 से ज्यादा मौतें, सैकड़ों लोग लापताइस प्राकृतिक आपदा में अब तक 155 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि होने की बात सामने आई है, जबकि सैकड़ों लोग लापता बताए जा रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 133 भारतीय नागरिकों के भी लापता होने की सूचना है। रासुवा, नुवाकोट और भोटेकोशी-त्रिशूली नदी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में शामिल हैं। आपदा के कारण सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, पुल बह गए और होटल सहित कई इमारतों को नुकसान पहुंचा। हाइड्रोपावर परियोजनाएं भी प्रभावित हुई हैं। नेपाल की सेना, प्रशासन और स्थानीय बचाव दल राहत एवं बचाव अभियान में जुटे हैं। हालांकि, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी भूभाग, भारी मलबे और लगातार बने जोखिम के कारण राहत कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। क्या यह सिर्फ बाढ़ थी? इस घटना को समझने के लिए फ्लैश फ्लड और सामान्य बाढ़ के बीच अंतर समझना जरूरी है। सामान्य बाढ़ में पानी का स्तर अपेक्षाकृत धीरे-धीरे बढ़ सकता है, जबकि फ्लैश फ्लड बेहद कम समय में तेज बहाव के साथ आती है। पहाड़ी इलाकों में यदि भूस्खलन या बर्फ-चट्टान का बड़ा हिस्सा नदी को कुछ समय के लिए रोक देता है, तो उसके पीछे पानी जमा होने लगता है। अवरोध टूटते ही यह पानी अचानक भारी वेग से नीचे की ओर बढ़ता है। रास्ते में मौजूद चट्टान, मिट्टी, पेड़ और अन्य मलबा भी इसके साथ बहने लगता है।
यही मिश्रण फ्लैश फ्लड को और ज्यादा विनाशकारी बना देता है। नेपाल की मौजूदा घटना में भी इसी तरह की प्रक्रियाओं की भूमिका की जांच की जा रही है। हालांकि, पूरी घटना के सटीक वैज्ञानिक कारण और विभिन्न प्रक्रियाओं के योगदान को लेकर विस्तृत अध्ययन अभी जरूरी है। ग्लेशियर का कितना रोल? हिमालय में ग्लेशियर स्थिर बर्फ की चट्टान नहीं, बल्कि लगातार बदलने वाली प्राकृतिक संरचना हैं। तापमान में बदलाव से बर्फ पिघलती है, ग्लेशियर के भीतर और नीचे पानी जमा हो सकता है तथा बर्फ में दरारें बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही ग्लेशियर के ऊपर मौजूद चट्टानों और ढलानों की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में बर्फ, चट्टान और मलबे का बड़ा हिस्सा अचानक नीचे खिसक सकता है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने, भूस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF जैसे खतरे इसी वजह से गंभीर माने जाते हैं। हालांकि किसी एक घटना को सीधे ग्लोबल वार्मिंग या केवल ग्लेशियर टूटने से जोड़ देना उचित नहीं होगा। इसके लिए घटनास्थल के वैज्ञानिक आंकड़ों और विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता होती है। भारत और बिहार के लिए कितना खतरा? नेपाल और भारत के बीच साझा नदी तंत्र होने के कारण नेपाल में होने वाली ऐसी घटनाओं पर भारत की भी नजर रहती है। हिमालय से निकलने वाली कई नदियां नेपाल से होकर भारत में प्रवेश करती हैं और बिहार समेत कई राज्यों के नदी तंत्र को प्रभावित करती हैं। नेपाल के ऊपरी इलाकों में अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नदी में पहुंचने पर निचले क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। बिहार के लिए विशेष रूप से नेपाल में होने वाली भारी बारिश, नदी के जलस्तर और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति पर लगातार निगरानी जरूरी है। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि नेपाल में आने वाली हर फ्लैश फ्लड सीधे बिहार में बाढ़ का रूप नहीं लेती। भारत में इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि नदी तंत्र में कितना पानी पहुंचता है, उस समय स्थानीय बारिश कितनी है और संबंधित नदियों का जलस्तर पहले से किस स्थिति में है। इसलिए इस तरह की घटनाओं में घबराहट के बजाय सतर्कता और समय पर सूचना सबसे महत्वपूर्ण है। आपदा में इंसानी भूमिका कितनी? किसी एक प्राकृतिक आपदा के लिए यह कहना कि इंसान ही इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन यह भी सच है कि मानवीय गतिविधियां प्राकृतिक जोखिम को बढ़ा सकती हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन, ब्लैक कार्बन और धूल का जमाव, वनों की कटाई तथा संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में सड़क, सुरंग और बड़े निर्माण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव डालते हैं। प्राकृतिक खतरे को रोका नहीं जा सकता, लेकिन अनियोजित विकास और कमजोर पर्यावरणीय प्रबंधन किसी आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं। हिमालयी क्षेत्र में सबसे बड़ी चिंता ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे को लेकर भी है। यदि किसी प्राकृतिक बांध के टूटने से ऐसी झील अचानक खाली होती है, तो कम समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है। इसके साथ बर्फ और चट्टानों का खिसकना तथा फ्लैश फ्लड का खतरा जुड़ जाए तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। समाधान क्या है? ऐसी आपदाओं से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका केवल आपदा के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि उससे पहले खतरे की पहचान करना है। इसके लिए ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी, नदी के जलस्तर की रियल-टाइम मॉनिटरिंग और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी हैं। इसके साथ ही संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य निर्माण की वैज्ञानिक समीक्षा की जानी चाहिए। नेपाल और भारत के बीच आपदा संबंधी सूचनाओं का तेज और भरोसेमंद आदान-प्रदान भी बेहद महत्वपूर्ण है। आम लोगों के लिए भी सावधानी जरूरी है। बाढ़ की चेतावनी मिलने पर नदी और निचले इलाकों से तुरंत सुरक्षित ऊंचाई की ओर जाना चाहिए। तेज बहाव वाले पानी को पैदल या वाहन से पार करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और प्रशासन की आधिकारिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए। नेपाल की यह त्रासदी सिर्फ एक देश की आपदा नहीं, बल्कि पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है। पहाड़ बाहर से स्थिर दिखाई देते हैं, लेकिन उनके भीतर भूगर्भीय और जलवायु संबंधी बदलाव लगातार जारी रहते हैं। आज कोई ग्लेशियर या चट्टानी ढलान खिसकती है, तो उसका असर कुछ ही समय में सीमा पार के नदी तंत्र तक पहुंच सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी। असली सवाल यह है कि क्या हम उसके संकेतों को समय रहते पहचान पाएंगे। प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत चेतावनी प्रणाली, जिम्मेदार विकास और बेहतर आपदा प्रबंधन के जरिए जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नेपाल की इस त्रासदी की सबसे बड़ी सीख भी यही है—हिमालय को जीतने की नहीं, उसे समझने और उसके साथ संतुलन बनाकर चलने की जरूरत है।