ग्वालियर से मुंबई तक का प्रेरणादायक सफर
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 7 अक्टूबर 1976 को जन्मे इस लोकप्रिय अभिनेता का शुरुआती जीवन काफी साधारण रहा था। अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले वह पेशेवर रूप से जिम ट्रेनर और मॉडल के रूप में काम करते थे। वर्ष 2002 में उन्होंने ग्रैसिम मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता के फाइनल तक का सफर तय किया था जिसके बाद उनके लिए मायानगरी मुंबई के रास्ते खुले। शुरुआती दौर में उन्होंने सात फेरे और कुछ तो लोग कहेंगे जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों में काम करके दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई थी। इसके बाद उन्हें बॉलीवुड में संजय लीला भंसाली की निर्देशित फिल्म गोलियों की रासलीला राम-लीला के जरिए एक बड़ा ब्रेक हासिल हुआ। अभिनय के अलावा उन्होंने पर्दे के पीछे अपनी भारी और गंभीर आवाज से एक अलग ही पहचान बनाई जो उन्हें बाकी कलाकारों से काफी अलग खड़ा करती है। आज उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर उनके चाहने वाले और फिल्म जगत के लोग उन्हें बधाइयां दे रहे हैं।
राजामौली की नजर में कैसे चुने गए बाहुबली
दिग्गज निर्देशक एसएस राजामौली अपनी फिल्म बाहुबली के हिंदी संस्करण के लिए एक ऐसी सशक्त आवाज की तलाश कर रहे थे जो किरदार की गरिमा को दर्शा सके। उस समय हिंदी डबिंग के लिए कई बड़े और नामचीन कलाकारों के नाम चर्चा में चल रहे थे। निर्देशक राजामौली ने जब शरद केलकर से मुलाकात की तो उन्होंने काफी देर तक उनकी शारीरिक भाषा और बोलने के ढंग को बहुत बारीकी से परखा। उस मुलाकात के तुरंत बाद यह निर्णय लिया गया कि प्रभास के इस विशालकाय किरदार के लिए उनसे बेहतर कोई दूसरा विकल्प हो ही नहीं सकता है। उन्होंने फिल्म में अमरेंद्र बाहुबली और महेंद्र बाहुबली दोनों ही महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए अपनी आवाज का जादू चलाया था। उनका मानना है कि डबिंग का कार्य केवल कागज पर लिखे हुए संवादों को माइक्रोफोन के सामने बैठकर पढ़ देना मात्र नहीं होता है। जब वह स्टूडियो के भीतर जाकर किसी दृश्य के लिए चिल्लाते या भावुक होते हैं तो वह उस किरदार की सच्चाई को जीवंत कर देते हैं। यही मुख्य कारण था कि प्रभास की बाद की फिल्म आदिपुरुष में भी निर्माताओं ने हिंदी संवादों के लिए उन पर ही पूरा भरोसा जताया था।
हॉलीवुड फिल्मों तक फैला आवाज का दायरा
इस जाने-माने कलाकार का सफर केवल भारतीय फिल्मों और टेलीविजन तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। यदि दर्शक हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी भाषा में देखना पसंद करते हैं तो उन्होंने अनजाने में कई बार इनकी ही आवाज को सुना होगा। दुनिया भर की सबसे बड़ी एक्शन फिल्मों और फ्रेंचाइजी के हिंदी डब संस्करणों में उन्होंने अपने अभिनय और आवाज का लोहा मनवाया है। इसके अलावा द लीजेंड ऑफ हनुमान जैसी बेहद लोकप्रिय एनिमेटेड श्रृंखला में भी उन्होंने अपनी आवाज से एक अलग समां बांधा था। इतनी बड़ी सफलता और देश भर में एक बहुत बड़ा प्रशंसक वर्ग होने के बावजूद वह बेहद साधारण और जमीन से जुड़े हुए इंसान बने हुए हैं। उनका कहना है कि उन्हें खुद अपनी आवाज में कोई बहुत बड़ी विशेषता नजर नहीं आती है। हालांकि जब लोग हवाई अड्डों या सड़कों पर केवल उनकी आवाज सुनकर उन्हें पहचान लेते हैं तो वह अपने जीवन को पूरी तरह धन्य महसूस करते हैं। आज उनके पचासवें जन्मदिन पर उनका यह सफर आने वाली पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक बड़ी प्रेरणा बन चुका है।