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बड़ी प्रतिक्रिया: पद्मावत के लेखक ने जौहर दृश्य पर दी सफाई, कहा यह इतिहास की सच्चाई है
संजय लीला भंसाली की लोकप्रिय फिल्म पद्मावत को लेकर एक बार फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि फिल्म के लेखक ने इसके एक विवादास्पद दृश्य पर खुलकर अपनी बात रखी है और आलोचकों को जवाब दिया है।
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Ankit Yadav
03 सित 2026, 11:12
बॉलीवुड की बहुचर्चित फिल्मों में शुमार 'पद्मावत' एक बार फिर सुर्खियों के दायरे में आ गई है। रिलीज के इतने साल बीत जाने के बाद भी इस फिल्म के विभिन्न पहलुओं पर बहस का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। हाल ही में इस कलाकृति के लेखक ने फिल्म के सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले और संवेदनशील माने जाने वाले जौहर के प्रसंग पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। उनका यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है जब सिनेमाई चित्रण और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच संतुलन को लेकर अक्सर बौद्धिक गलियारों में बहस होती रहती है। लेखक ने साफ तौर पर कहा कि फिल्म के भीतर जिस प्रसंग को दिखाया गया है, वह कोरी कल्पना नहीं बल्कि उस कालखंड की एक अकाट्य और दर्दनाक वास्तविकता थी।
ऐतिहासिक सत्य बनाम सिनेमाई आलोचना
जब यह सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी, तब इसके कई दृश्यों, विशेषकर अंतिम चरण के जौहर अनुष्ठान को लेकर समाज के एक वर्ग द्वारा काफी तीखी प्रतिक्रियाएं दी गई थीं। कुछ लोगों ने इसे रूढ़िवादिता को बढ़ावा देने वाला बताया था, तो वहीं इतिहासकारों और समर्थकों ने इसे राजपूत आन, बान और शान के ऐतिहासिक प्रतीक के रूप में सराहा था। इस विषय पर बात करते हुए लेखक ने जोर देकर कहा कि कोई भी कलाकृति अपनी अच्छाई या बुराई के दायरे से परे होकर उस समय की परिस्थितियों को दर्शाती है। उन्होंने इस बात पर भी अफसोस जताया कि कुछ लोग बिना पूरे संदर्भ को समझे सिर्फ विवाद खड़े करने या आलोचना करने के उद्देश्य से ही चीजों को देखते हैं, जबकि उन्हें उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करना चाहिए।
विवादों से पुराना नाता
गौरतलब है कि इस फिल्म का सफर इसके निर्माण के शुरुआती दिनों से ही विवादों और अड़चनों से घिरा रहा है। शूटिंग के दौरान सेट पर तोड़फोड़ से लेकर नाम बदलने और देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों तक, इस परियोजना को हर कदम पर कड़ी परीक्षाओं से गुजरना पड़ा था। इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर इसने व्यावसायिक रूप से जबरदस्त सफलता हासिल की और इसके संगीत, अभिनय और भव्य सेट डिजाइन की चौतरफा प्रशंसा हुई। दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह और शाहिद कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों से सजी इस ऐतिहासिक गाथा ने दर्शकों के दिलों पर एक गहरी छाप छोड़ी थी। इसके बावजूद, इसके कुछ दृश्यों का सामाजिक प्रभाव आज भी बहस का एक प्रमुख विषय बना हुआ है और समय-समय पर इससे जुड़े लोग इस पर अपनी राय रखते रहते हैं।
लेखक का स्पष्ट संदेश
लेखक के इस ताज़ा बयान के बाद एक बार फिर से सोशल मीडिया और फिल्म जगत में इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि क्या ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को आधुनिक नजरिए से तौलना सही है या फिर उन्हें उनके दौर के चश्मे से ही देखा जाना चाहिए। कई फिल्म समीक्षकों का मानना है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और ऐतिहासिक संवेदनशीलता के बीच एक बारीक रेखा होती है, जिसे पार करने पर इस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक है। हालांकि, लेखक के इस स्पष्टीकरण ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि कला और इतिहास के अंतर्संबंधों पर चल रही यह बहस इतनी आसानी से समाप्त होने वाली नहीं है और भविष्य में भी इस पर चर्चाएं होती रहेंगी।