हाल ही में दिए गए अपने बयानों के जरिए अभिनेता नानी ने मनोरंजन जगत में भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर होने वाले वर्गीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका मुख्य तर्क यह था कि जब कोई हिंदी फिल्म पूरे देश में रिलीज होती है और अपनी मूल भाषा के अलावा अन्य भाषाओं में कारोबार करती है, तब उसे सामान्य रूप से रिलीज हुई फिल्म माना जाता है। इसके विपरीत, जब दक्षिण भारतीय राज्यों की फिल्में अपनी क्षेत्रीय सीमाओं को लांघकर पूरे देश के दर्शकों के बीच पहुंचती हैं, तब उन्हें एक अलग और विशेष टैग यानी 'पैन-इंडिया' के रूप में प्रचारित किया जाता है। नani के अनुसार यह भेद स्पष्ट रूप से एक दोहरे मापदंड को दर्शाता है, जो भारतीय सिनेमा के भीतर क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों और मानसिकता को उजागर करता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के समय में दर्शक भाषा की बाधाओं को पार करके बेहतरीन कहानियों को पसंद कर रहे हैं, ऐसे में इस तरह के कृत्रिम वर्गीकरणों की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए और सभी उद्योगों को एक समान नजरिए से देखा जाना चाहिए।
इस तरह की बहसें भारतीय फिल्म उद्योग के उस बदलते दौर में सामने आ रही हैं, जहां दक्षिण भारत की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कई मौकों पर बॉलीवुड की बड़ी प्रस्तुतियों को पीछे छोड़ दिया है। पिछले कुछ वर्षों में 'बाहुबली', 'आरआरआर', 'केजीएफ' और 'पुष्पा' जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि एक मजबूत कहानी और उच्च कोटि का निर्माण किसी भी भाषाई दायरे में बंधा नहीं रहता है। इन फिल्मों की राष्ट्रव्यापी सफलता ने पारंपरिक हिंदी फिल्म उद्योग के प्रभुत्व को चुनौती दी है, जिसके बाद से फिल्म समीक्षकों, निर्देशकों और कलाकारों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर भारतीय सिनेमा में राष्ट्रीय स्तर की सफलता को किस प्रकार परिभाषित किया जाना चाहिए। बॉलीवुड और दक्षिण के उद्योगों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का यह दौर लगातार गहराता जा रहा है, और इसी के साथ विभिन्न फिल्म उद्योगों के बीच की व्यावसायिक और सांस्कृतिक गतिशीलता भी तेजी से बदल रही है। नानी जैसी प्रमुख हस्तियों द्वारा ऐसे मुद्दों को सार्वजनिक मंचों पर उठाना इस बात का संकेत है कि अब कलाकार अपनी बात खुलकर रखने और स्थापित परिपाटियों पर सवाल उठाने से पीछे नहीं हट रहे हैं, जिससे पूरे उद्योग में आत्ममंथन का माहौल बन रहा है.
भविष्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रकार की तीखी प्रतिक्रियाएं भारतीय फिल्म जगत में भाषाई और क्षेत्रीय दीवारों को गिराने में एक उत्प्रेरक का काम कर सकती हैं। आने वाले दिनों में जब भी कोई बड़ी क्षेत्रीय फिल्म राष्ट्रीय स्तर पर रिलीज होगी, तो उसके प्रचार और मीडिया कवरेज में इस तरह के बयानों का गहरा असर देखने को मिल सकता है। दर्शकों के बीच भी अब इस बात को लेकर जागरूकता बढ़ रही है कि सिनेमा को केवल मुंबई या किसी एक विशेष केंद्र तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि देश के हर कोने से आने वाली रचनात्मकता का समान रूप से सम्मान होना चाहिए। उम्मीद की जा रही है कि इस वैचारिक बहस के बाद फिल्म निर्माता और वितरक शब्दावली के इस खेल से आगे बढ़कर सभी भाषाओं की फिल्मों को एक निष्पक्ष मंच प्रदान करने की दिशा में अधिक गंभीर कदम उठाएंगे। अंततः यह बदलाव भारतीय सिनेमा को और अधिक एकीकृत, सशक्त और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मददगार साबित होगा, जहां हर भाषा की फिल्म को उसकी अपनी काबिलियत के आधार पर आंका जाएगा न कि किसी भौगोलिक या भाषाई पूर्वाग्रह के चश्मे से।