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ऑस्कर की दौड़: विवेक वासवानी ने बताया क्यों नहीं चुनी गई फिल्म धुरंधर

ऑस्कर पुरस्कारों में भारतीय प्रविष्टि के रूप में फिल्म धुरंधर के चयन न होने पर ज्यूरी सदस्य विवेक वासवानी ने स्पष्टीकरण दिया है, जिसमें उन्होंने चयन प्रक्रिया और फिल्म से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की है।

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Ankit Yadav
20 सित 2026, 16:21
ऑस्कर की दौड़: विवेक वासवानी ने बताया क्यों नहीं चुनी गई फिल्म धुरंधर

भारतीय सिनेमा जगत में हर वर्ष इस बात को लेकर बड़ी उत्सुकता रहती है कि ऑस्कर पुरस्कारों के लिए देश की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में किस फिल्म का चयन किया जाएगा। इसी कड़ी में जब इस बार फिल्म धुरंधर को लेकर चर्चाएं गर्म थीं और यह कयास लगाए जा रहे थे कि यह फिल्म अकादमी पुरस्कारों की दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकती है, तब ज्यूरी के महत्वपूर्ण सदस्य विवेक वासवानी ने इस पूरे घटनाक्रम पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से चयन समिति के समक्ष विभिन्न फिल्मों के नामों पर विचार किया जाता है और किन मानदंडों के आधार पर अंतिम निर्णय लिया जाता है। उनके इस बयान के सामने आने के बाद फिल्म इंडस्ट्री के भीतर और बाहर इस बात को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए भारतीय फिल्मों का चयन किस प्रकार होना चाहिए और क्या हमारे मापदंड वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुकूल हैं या नहीं।

इस पूरे प्रकरण के वैधानिक और रचनात्मक पृष्ठभूमि को समझें तो ऑस्कर की चयन प्रक्रिया हमेशा से ही जटिल और कड़ी चुनौतियों से भरी रही है। भारत की तरफ से फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से गठित की जाने वाली ज्यूरी देश भर से आने वाली तमाम बड़ी फिल्मों का गहराई से मूल्यांकन करती है। इसमें न केवल व्यावसायिक सफलता बल्कि कहानी की पटकथा, निर्देशन की गुणवत्ता, अभिनय और सबसे महत्वपूर्ण रूप से वैश्विक दर्शकों के साथ उसका जुड़ाव जैसे पहलू शामिल होते हैं। विवेक वासवानी ने अपने वक्तव्य में इसी बात पर प्रकाश डाला कि चयन प्रक्रिया के दौरान ज्यूरी सदस्यों को किन कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और कैसे हर सदस्य अपने स्तर पर सर्वश्रेष्ठ निर्णय लेने का प्रयास करता है। भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से विषयगत विविधता आई है, उसने ज्यूरी के सामने विकल्पों की संख्या तो बढ़ाई है, साथ ही सही फिल्म को चुनने की चुनौती को भी कई गुना बढ़ा दिया है।

आने वाले समय में इस तरह के खुलासे और स्पष्टीकरण भारतीय फिल्म उद्योग की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाने का काम करेंगे। जब ज्यूरी के सदस्य खुद आगे आकर चयन के पीछे के कारणों और तर्कों को साझा करते हैं, तो दर्शकों और फिल्म निर्माताओं दोनों को ही यह समझने में आसानी होती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किस प्रकार की कहानियों को प्राथमिकता दी जाती है। फिल्म धुरंधर को लेकर हुई इस चर्चा ने एक बार फिर से इस बात को रेखांकित किया है कि भारतीय सिनेमा को यदि वैश्विक मंच पर अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बनानी है, तो न केवल हमारी कहानियों की पटकथा को बल्कि उनके प्रस्तुतिकरण को भी वैश्विक मानकों के बिल्कुल सटीक बैठना होगा। इस पूरी प्रक्रिया से भविष्य के फिल्म निर्माताओं को यह सीख मिलती है कि उन्हें अपनी रचनाओं में किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि वे आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की दौड़ में अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर सकें।

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