सिनेमाई गलियारों और बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के लिहाज से फिल्म 'धुरंधर' ने हाल के दिनों में सफलता के तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे और वैश्विक स्तर पर भारतीय सिनेमा का डंका बजाते हुए लगभग तीन हजार करोड़ रुपये का भारी-भरकम कारोबार किया था। इसके बावजूद, जब ऑस्कर पुरस्कारों के लिए आधिकारिक भारतीय प्रविष्टि भेजने की बारी आई, तो इस ब्लॉकबस्टर फिल्म का नाम इस प्रतिष्ठित सूची से गायब मिला। इस फैसले के सामने आने के बाद से ही फिल्म जगत में तीखी बहस छिड़ गई है कि क्या व्यावसायिक सफलता और कलात्मक उत्कृष्टता के पैमानों के बीच का यह अंतर हर साल इसी तरह भारतीय सिनेमा के रास्ते रोकता रहेगा। फिल्म ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने के साथ-साथ सिनेमाघरों में जबरदस्त भीड़ जुटाई थी, लेकिन अकादमी पुरस्कारों की चयन समिति के अपने कड़े और विशिष्ट मानक होते हैं जो अक्सर विशुद्ध रूप से कमर्शियल सिनेमा के दायरे से अलग होते हैं।
किसी भी फिल्म को ऑस्कर के अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी या अन्य प्रमुख वर्गों में भेजने के लिए केवल बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इसके लिए जूरी के सदस्यों द्वारा तय किए गए कथानक, तकनीकी बारीकियों, सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और वैश्विक सिनेमाई मानकों पर खरा उतरना अनिवार्य होता है। अतीत में भी ऐसा कई बार देखा गया है कि देश में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली या रिकॉर्ड तोड़ने वाली फिल्मों को ऑस्कर की चयन प्रक्रिया में निराशा हाथ लगी है, क्योंकि चयन समिति अक्सर ऐसी कहानियों को प्राथमिकता देती है जो कलात्मक दृष्टि से गहरी हों और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के बीच भारतीय संस्कृति का सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करती हों। 'धुरंधर' के मामले में भी माना जा रहा है कि फिल्म के विशालकाय पैमाने और कमर्शियल ट्रीटमेंट के आगे शायद वे सूक्ष्म कलात्मक और वैचारिक पहलू दब गए होंगे जिनकी अकादमी की ओर से विशेष रूप से तलाश की जाती है, हालांकि इस पर आधिकारिक रूप से चयन समिति के तर्क पूरी तरह स्पष्ट होना अभी बाकी है।
इस घटनाक्रम के बाद भारतीय फिल्म उद्योग में एक बार फिर इस बात पर गंभीर मंथन शुरू हो गया है कि हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए फिल्मों का चयन करते समय बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों और वैश्विक कलात्मक कसौटियों के बीच कैसे संतुलन बिठाना चाहिए। फिल्म समीक्षकों का मानना है कि केवल वित्तीय सफलता के आधार पर किसी फिल्म को ऑस्कर योग्य मान लेना सही नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो ताकि देश भर के दर्शकों को यह समझ आ सके कि किस आधार पर फिल्मों को बाहर किया गया। आने वाले समय में बॉलीवुड के निर्माताओं को शायद अपनी रणनीतियों में बदलाव करना होगा ताकि वे एक तरफ बड़े बजट की कमर्शियल फिल्में बना सकें और दूसरी तरफ ऐसी कहानियों को भी आगे ला सकें जो वैश्विक मंच पर भारत की सिनेमाई प्रतिष्ठा को मजबूती से स्थापित कर सकें। फिलहाल 'धुरंधर' के इस रेस से बाहर होने ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बॉक्स ऑफिस के बादशाह और ऑस्कर के दावेदार होना दो बिल्कुल अलग और कठिन रास्ते हैं।