दुनियाभर में पेट्रोल के दामों में व्यापक असमानता
विभिन्न देशों में मोटर ईंधन की खुदरा बिक्री दरों में बहुत बड़ा अंतर देखा जा रहा है जो वैश्विक स्तर पर एक बड़ा विषय बना हुआ है। ऑक्टेन-95 श्रेणी के ईंधनों के लिए वैश्विक स्तर पर औसतन एक सौ इक्यावन दशमलव अठारह रुपये प्रति लीटर का भाव तय होता है। कई राष्ट्रों में प्रति लीटर ईंधन की लागत तीन रुपये से भी नीचे चल रही है जबकि कुछ चुनिंदा जगहों पर यही वस्तु चार सौ रुपये के आंकड़े को भी पार कर चुकी है। सबसे किफायती ईंधन बेचने वाले क्षेत्रों और सबसे महंगी दरों वाले बाजारों के बीच लगभग एक सौ नब्बे गुना का अंतर बना हुआ है। वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक लीबिया में एक लीटर ईंधन की कीमत मात्र दो दशमलव इक्कीस रुपये दर्ज की गई है। इसके अलावा ईरान में यह दो दशमलव बहत्तर रुपये और वेनेजुएला में तीन दशमलव बत्तीस रुपये प्रति लीटर के स्तर पर उपलब्ध है। इन राष्ट्रों में नागरिकों को ईंधन बहुत ही कम खर्च पर मिल जाता है जिससे वहां की स्थानीय जनता को काफी राहत मिलती है। इसके ठीक विपरीत स्थिति हांगकांग जैसे महानगर में देखने को मिलती है जहां मोटर चालकों को एक लीटर ईंधन के लिए चार सौ बीस दशमलव चौंतीस रुपये चुकाने पड़ते हैं। दुनिया भर के विभिन्न देशों में ईंधन की इन कीमतों का निर्धारण मुख्य रूप से वहां की कर प्रणालियों सरकारी छूट नीतियों और स्थानीय प्रशासनिक निर्णयों के आधार पर तय होता है।
भारत और अमेरिका में ईंधन की खुदरा दरों की स्थिति
भारतीय बाजारों में मोटर ईंधन की औसत दरें वैश्विक औसत स्तर की तुलना में कम बनी हुई हैं जिससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिलती है। बारह अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार भारत में एक लीटर ईंधन का औसत मूल्य एक सौ आठ दशमलव पैंसठ रुपये है। यह आंकड़ा वैश्विक मानक से बयालीस दशमलव त्रेपन रुपये कम बैठता है। हालांकि लीबिया और वेनेजुएला जैसे बेहद सस्ते देशों की तुलना की जाए तो भारत में ईंधन की दरें काफी ऊंची मानी जाती हैं। अमेरिका में एक लीटर ईंधन की खुदरा लागत एक सौ ग्यारह दशमलव नौ शून्य रुपये आंकी गई है जो भारतीय औसत मूल्य के बिल्कुल करीब ठहरती है। एक उन्नत और विकसित अर्थव्यवस्था होने के बावजूद अमेरिकी बाजार में ईंधन का यह स्तर भारत के लगभग बराबर ही चल रहा है। भारत के भीतर सरकारी क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा संचालित पंपों पर पिछले मई महीने के बाद से खुदरा बिक्री दरों में कोई वृद्धि नहीं की गई है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र की ईंधन विक्रेता कंपनियों ने हाल ही में अपने दामों में संशोधन किया है। नायरा कंपनी ने सितंबर के दौरान तथा जियो-बीपी ने अक्टूबर के महीने में अपने पेट्रोल और डीजल के दामों में पाँच रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की है। इन व्यावसायिक निर्णयों और सरकारी मूल्य नियंत्रण नीतियों के कारण विभिन्न देशों में उपभोक्ताओं को अलग-अलग दरों का भुगतान करना पड़ रहा है।
कच्चे तेल की स्थिति और कीमतों में अंतर के कारण
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड यानी कच्चे तेल का भाव प्रति बैरल एक सौ पाँच डॉलर से ऊपर ट्रेड कर रहा है। हालांकि केवल कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय लागत ही अंतिम खुदरा मूल्य को तय नहीं करती है बल्कि इसके पीछे कई अन्य महत्वपूर्ण कारक भी जिम्मेदार होते हैं। रिफाइनिंग प्रक्रिया का खर्च परिवहन पर आने वाला भारी भरकम धन और स्थानीय नीतियां भी इस पूरी व्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं। कई तेल उत्पादक देश अपने स्थानीय नागरिकों को जीवनयापन में सहूलियत देने के उद्देश्य से ईंधन पर भारी सरकारी सब्सिडी प्रदान करते हैं। इसी वित्तीय सहायता के कारण उन राष्ट्रों में ईंधन के दाम बेहद कम स्तर पर स्थिर रहते हैं। इसके उलट जिन देशों में सरकारों द्वारा ईंधन पर भारी-भरकम कर लगाए जाते हैं वहां खुदरा बाजार में कीमतें बहुत तेजी से ऊपर चली जाती हैं। कुछ चुनिंदा राष्ट्रों में सरकारें स्वयं ईंधन के दाम नियंत्रित करती हैं जबकि अन्य स्थानों पर यह पूरी तरह बाजार की मुक्त परिस्थितियों और माँग पर आधारित होता है। इन तमाम टैक्स प्रणालियों सब्सिडी प्रावधानों और मूल्य निर्धारण नीतियों के विभिन्न संयोजनों के कारण ही दुनिया के एक कोने में ईंधन बहुत सस्ता मिलता है जबकि दूसरे कोने में इसके लिए भारी रकम चुकानी पड़ती है।