व्यापारियों का आक्रोश और नो यूपीआई डे का ऐलान देशभर के छोटे और मध्यम स्तर के मोबाइल दुकानदारों ने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई लेनदेन पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट थोपे जाने के सरकारी और वित्तीय प्रस्तावों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। इस मनमाने शुल्क और वित्तीय बोझ के विरोधस्वरूप सभी दुकानदारों ने मिलकर आगामी 2 अक्टूबर को देशभर में पूरी तरह से नो यूपीआई डे के रूप में मनाने का बड़ा और ऐतिहासिक ऐलान किया है। इस विशेष दिन के दौरान व्यापारी वर्ग डिजिटल भुगतान के माध्यमों का पूर्ण बहिष्कार करने का मन बना चुका है ताकि अपनी मांगों और असंतोष को सीधे तौर पर संबंधित नियामकों तथा नीति निर्माताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सके। दुकानदारों का स्पष्ट रूप से यह मानना है कि इस प्रकार के शुल्क लागू होने से उनके दैनिक कारोबार का मार्जिन बुरी तरह प्रभावित होगा और छोटे स्तर पर ग्राहकों को डिजिटल भुगतान की सुविधा देना उनके लिए धीरे-धीरे पूरी तरह से असंभव हो जाएगा।
मर्चेंट डिस्काउंट रेट और डिजिटल भुगतान की अर्थनीति आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था में डिजिटल भुगतान प्रणाली की रीढ़ माने जाने वाले यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस पर शुल्क लगाने की सुगबुगाहट ने पिछले कुछ समय से व्यापारिक जगत में भारी चिंता पैदा कर दी है। मर्चेंट डिस्काउंट रेट मूल रूप से वह शुल्क होता है जो किसी भी मर्चेंट या दुकान द्वारा अपने ग्राहकों से डिजिटल माध्यमों के जरिए भुगतान प्राप्त करने के एवज में वित्तीय संस्थानों और पेमेंट गेटवे प्रदाताओं को अदा किया जाता है। अब तक सरकार और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के प्रयासों से यह व्यवस्था पूरी तरह से शुल्क मुक्त रखी गई थी ताकि देश के कोने-कोने में छोटे से छोटे दुकानदार भी बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय दबाव के डिजिटल लेन-देन को सहजता से अपना सकें। जब इस प्रकार के बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त कर या शुल्क का प्रस्ताव लाया जाता है तो इससे किराना स्टोर, मोबाइल विक्रेता और रेहड़ी-पटरी वाले छोटे व्यापारी सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके पास बड़े कॉर्पोरेट प्रतिष्ठानों की तरह भारी मात्रा में वित्तीय संसाधन या मार्जिन नहीं होते हैं।
आगामी असर और समाधान की दिशा में चुनौतियां आगामी 2 अक्टूबर को प्रस्तावित नो यूपीआई डे के राष्ट्रव्यापी आयोजन से देश के खुदरा और डिजिटल पेमेंट बाजार में एक बड़ा व्यवधान उत्पन्न होने की पूरी आशंका जताई जा रही है। यदि देश भर के मोबाइल और अन्य छोटे दुकानदार एक साथ इस वित्तीय प्रणाली से दूरी बनाते हैं तो आम उपभोक्ताओं को रोजमर्रा की खरीदारी के दौरान गंभीर असुविधा का सामना करना पड़ सकता है जिससे डिजिटल इंडिया अभियान की गति पर भी कुछ समय के लिए असर पड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब नीति निर्माताओं, फिनटेक कंपनियों और व्यापारी संगठनों के बीच उच्च स्तर पर बैठकों और वार्ताओं का दौर शुरू होने की उम्मीद है ताकि इस गतिरोध को समय रहते सुलझाया जा सके। यदि सरकार इस मर्चेंट डिस्काउंट रेट के प्रस्ताव पर पुनर्विचार नहीं करती है तो आने वाले दिनों में यह विरोध प्रदर्शन और अधिक उग्र रूप ले सकता है जिससे संपूर्ण डिजिटल अर्थव्यवस्था की कार्यप्रणाली पर दूरगामी और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।