लाहौर में हुई थी कारोबार की नींव
व्यापारिक इतिहास के अनुसार गोरा मल हरि कंपनी की शुरुआत साल 1914 में लाहौर शहर में एक व्यक्तिगत स्वामित्व वाली इकाई के रूप में की गई थी। इस कारोबार के संस्थापक हरिराम थे जिन्होंने शुरुआत में घरेलू कपड़े धोने के साबुन के उत्पादन पर विशेष ध्यान केंद्रित किया था। उस दौर में आज की तरह बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन का बाजार नहीं था इसलिए स्थानीय स्तर पर बेहतरीन गुणवत्ता वाला वॉशिंग साबुन तैयार करना एक बहुत बड़ा व्यवसाय माना जाता था। यही शुरुआती अनुभव और मेहनत आगे चलकर इस ऐतिहासिक ब्रांड की मजबूत नींव साबित हुई। कंपनी का मुख्य लक्ष्य हमेशा से ही आम नागरिकों के दैनिक जीवन में काम आने वाले घरेलू उत्पादों के बाजार को साधना था। समय बीतने के साथ इस प्रारंभिक कार्य ने एक बड़े और सफल उद्यम का रूप ले लिया जिसने बाद में कई पीढ़ियों तक अपने व्यापार को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया।
कानूनी मान्यता और ट्रेडमार्क का सफर
व्यवसाय के दस्तावेजों के मुताबिक इस प्रसिद्ध ब्रांड से जुड़े 555 ट्रेडमार्क का निरंतर उपयोग साल 1924 से लगातार किया जा रहा था। स्थापना के एक दशक बाद इस नाम ने बाजार में अपनी एक विशेष पहचान बनानी शुरू कर दी थी। इसके बाद साल 1943 में इस ट्रेडमार्क को आधिकारिक तौर पर क्लास 3 के तहत पंजीकृत कराया गया जिसमें विशेष रूप से कपड़े धोने और नहाने के साबुन शामिल थे। इस कानूनी प्रक्रिया के बाद यह नाम केवल बाजार में बिकने वाला उत्पाद नहीं रहा बल्कि एक सुरक्षित और आधिकारिक ब्रांड बन गया। तरक्की के इस रास्ते पर कंपनी ने हमेशा ग्राहकों की संतुष्टि और उत्पाद की उच्च गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके अलावा आकर्षक और अनूठी पैकेजिंग भी इस ब्रांड की मुख्य पहचान का एक अहम हिस्सा बन गई। एक कॉपीराइट विवाद के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस बात को दर्ज किया गया था कि लगातार प्रचार और गुणवत्ता के कारण यह उत्पाद लोगों के बीच एक घरेलू नाम बन चुका था।
दिल्ली में विस्तार और पोर्टफोलियो का फैलाव
देश के विभाजन के बाद इस ऐतिहासिक कारोबारी विरासत को एक नए माहौल और नए शहर में दोबारा स्थापित करना पड़ा। धीरे-धीरे सारा कारोबार दिल्ली में शिफ्ट हो गया और गोरा मल हरि के नाम से आगे बढ़ने लगा। दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले के अनुसार राजधानी के रामा रोड औद्योगिक क्षेत्र में साल 1953 से साबुन निर्माण का काम शुरू हुआ था जिसे सत्यपाल मणकतला अपने पिता और परिवार के साथ मिलकर संभाल रहे थे। परिवार की अगली पीढ़ियों ने इस व्यवसाय को और अधिक व्यापक रूप दिया। कंपनी ने अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया और एक बड़ा डीलर नेटवर्क पूरे बाजार में तैयार किया। आधिकारिक बिक्री के आंकड़ों के अनुसार साल 1991-92 में कुल बिक्री करीब 22.29 करोड़ रुपये थी जो साल 2002-03 में बढ़कर लगभग 70.97 करोड़ रुपये तक जा पहुंची। समय के साथ कारोबार का दायरा बढ़ा और पोर्टफोलियो में टॉयलेट सोप, डिशवॉश बार, स्कॉरिंग पाउडर जैसे कई अन्य घरेलू सफाई उत्पाद भी शामिल कर लिए गए।