खुदरा दुकानदारों का एमडीआर शुल्कों के विरोध में कड़ा कदम देशभर के मोबाइल और छोटे खुदरा व्यापारियों ने डिजिटल भुगतान पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर शुल्कों के विरोध में एक अक्टूबर के बाद आगामी 2 अक्टूबर को नो यूपीआई दिवस के रूप में मनाने का आधिकारिक तौर पर आह्वान किया है। इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य वित्तीय लेनदेन पर कारोबारियों से वसूले जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों के खिलाफ आवाज उठाना है। खुदरा विक्रेताओं का संगठन लंबे समय से इन शुल्कों को पूरी तरह से समाप्त करने की मांग कर रहा है क्योंकि छोटे व्यापारियों के लिए हर छोटे-बड़े लेनदेन पर यह शुल्क चुकाना आर्थिक रूप से काफी कठिन होता जा रहा है। इस विशेष दिन पर दुकानदारों द्वारा यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई आधारित भुगतान स्वीकार न करने की संभावना जताई जा रही है, जिससे डिजिटल इकोनॉमी के एक बड़े हिस्से पर तात्कालिक असर पड़ सकता है। व्यापारियों का कहना है कि उनकी यह मुहिम तब तक जारी रहेगी जब तक भुगतान प्रणालियों को अधिक व्यापारी-अनुकूल नहीं बनाया जाता और इन अतिरिक्त शुल्कों के बोझ से उन्हें पूरी तरह से राहत नहीं मिल जाती।
डिजिटल भुगतान प्रणाली और एमडीआर शुल्कों का संपूर्ण आर्थिक संदर्भ भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान डिजिटल भुगतान प्रणाली ने अभूतपूर्व गति पकड़ी है और छोटे से लेकर बड़े बाजारों तक में नकदी रहित लेनदेन आम बात हो गई है। हालांकि इसके पीछे वित्तीय संस्थानों, भुगतान गेटवे और बैंकों द्वारा मर्चेंट डिस्काउंट रेट के रूप में एक निश्चित शुल्क वसूला जाता है, जिसका भुगतान आमतौर पर व्यापारी को करना पड़ता है। कम कीमत वाले सामान बेचने वाले मोबाइल खुदरा विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों के लिए यह शुल्क उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा खा जाता है, जिससे उनकी व्यावसायिक लागत काफी बढ़ जाती है। इसी पृष्ठभूमि में व्यापारी संघों का यह मानना है कि देश की डिजिटल क्रांति की धुरी बनने वाले छोटे दुकानदारों को ही यदि सबसे अधिक वित्तीय नुकसान उठाना पड़े, तो यह व्यवस्था टिकाऊ नहीं हो सकती है। विभिन्न व्यापारिक संगठनों और नीति निर्माताओं के बीच इस मुद्दे पर समय-समय पर चर्चा होती रही है, परंतु कोई ठोस और स्थायी समाधान न निकल पाने के कारण कारोबारियों में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसका परिणाम इस प्रकार के देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रहा है।
आम नागरिकों और उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव तथा आगामी कदम मोबाइल खुदरा विक्रेताओं द्वारा घोषित इस अनोखे विरोध प्रदर्शन का सीधा असर उन आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है जो अपनी रोजमर्रा की खरीदारी के लिए पूरी तरह से डिजिटल भुगतान पर निर्भर रहते हैं। यदि दुकानदार वाकई यूपीआई के माध्यम से भुगतान लेना बंद कर देते हैं, तो ग्राहकों को या तो नकदी यानी कैश का उपयोग करना होगा अथवा पारंपरिक भुगतान के अन्य विकल्पों की तलाश करनी पड़ेगी। हालांकि कई उपभोक्ता संघों और डिजिटल विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के विरोध से लंबे समय में सरकार और फिनटेक कंपनियों का ध्यान व्यापारियों की समस्याओं की ओर आकृष्ट होगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार या भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआई इस मामले में हस्तक्षेप करके व्यापारियों के साथ कोई बीच का रास्ता निकालती है या नहीं। यदि समय रहते कोई सकारात्मक संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो भविष्य में इस तरह के विरोध प्रदर्शनों का दायरा और अधिक बढ़ सकता है, जिससे देश के डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।