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साइबर धोखाधड़ी का मामला: लखनऊ में बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट कर 34 लाख की ठगी

लखनऊ में एक बुजुर्ग व्यक्ति को साइबर अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसाकर बड़ी धोखाधड़ी की है। आरोपियों ने पीड़ित को बंधक बनाकर डराते हुए उनके खाते से 34 लाख रुपये की अवैध निकासी की।

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Ankit Yadav
07 अक्ट 2026, 12:37
साइबर धोखाधड़ी का मामला: लखनऊ में बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट कर 34 लाख की ठगी

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बड़ी वारदात

लखनऊ जिले में एक अत्यंत गंभीर साइबर अपराध सामने आया है जहां एक बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट का शिकार बनाया गया। डिजिटल अरेस्ट उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसमें जालसाज खुद को सरकारी अधिकारी या पुलिसकर्मी बताकर वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को एक स्थान पर रुकने के लिए मजबूर करते हैं। इस घटना के दौरान अपराधियों ने पीड़ित के साथ संपर्क बनाया और उन्हें किसी कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर लंबे समय तक अपने मोबाइल या कंप्यूटर कैमरे के सामने बने रहने का निर्देश दिया। बुजुर्ग को यह विश्वास दिलाया गया कि वह कानून की निगरानी में हैं और यदि उन्होंने निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। इस मनोवैज्ञानिक दबाव का अनुचित लाभ उठाते हुए अपराधियों ने उनके बैंक खातों की गोपनीय जानकारी प्राप्त कर ली। घटना के समय पीड़ित पूरी तरह से हतप्रभ और डरे हुए थे, जिसका फायदा उठाकर जालसाजों ने उनके बैंक खाते से 34 लाख रुपये की भारी भरकम राशि का हस्तांतरण अपने खातों में करवा लिया। यह मामला तब प्रकाश में आया जब पीड़ित ने पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अपने बैंक से संपर्क किया और उनके खाते की शेष राशि में भारी कमी देखी।

धोखाधड़ी की कार्यप्रणाली और जांच का दायरा

साइबर अपराधियों द्वारा अपनाई गई इस कार्यप्रणाली में तकनीक का उपयोग अपराध को अंजाम देने के लिए किया गया। सबसे पहले जालसाजों ने फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से बुजुर्ग से संपर्क किया और खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी होने का दावा किया। उन्होंने पीड़ित को आभासी रूप से हिरासत में लेने का नाटक किया ताकि वे किसी से मदद न मांग सकें। पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रहने के लिए कहा गया ताकि वह बाहर किसी और व्यक्ति से इस घटना के बारे में चर्चा न कर सके। इसके बाद अपराधियों ने पीड़ित को यह कहकर डराया कि उनका नाम किसी अवैध मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आया है। इस डर के वातावरण का उपयोग करते हुए अपराधियों ने बुजुर्ग से उनकी व्यक्तिगत बैंकिंग आईडी, पासवर्ड और ओटीपी जैसे संवेदनशील विवरण प्राप्त कर लिए। इन विवरणों का उपयोग करके अपराधियों ने 34 लाख रुपये की राशि को अलग-अलग खातों में अंतरित कर दिया। पुलिस अब इन खातों की डिजिटल फुटप्रिंट्स की जांच कर रही है ताकि अपराधियों तक पहुंचा जा सके। यह स्पष्ट है कि अपराधियों ने बेहद सुनियोजित तरीके से इस पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया और पीड़ित को मानसिक रूप से भ्रमित करके बड़ी धनराशि हड़प ली।

डिजिटल अरेस्ट का खतरा और बचाव के तरीके

डिजिटल अरेस्ट एक उभरता हुआ साइबर अपराध है जो विशेष रूप से समाज के वृद्ध नागरिकों को अपना निशाना बना रहा है। इस प्रकार की धोखाधड़ी में अपराधी तकनीक का उपयोग करके पीड़ित को यह महसूस कराते हैं कि वह पुलिस की निगरानी में है और उनका बाहर निकलना या किसी से बात करना गैर-कानूनी है। यह स्थिति समाज में डिजिटल साक्षरता की कमी का लाभ उठाती है और आम नागरिकों के लिए गंभीर चेतावनी का संकेत है। किसी भी सरकारी एजेंसी या पुलिस विभाग द्वारा कभी भी वीडियो कॉल के जरिए डिजिटल अरेस्ट नहीं किया जाता है और न ही किसी से धन की मांग की जाती है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा दावा करता है तो उसे तुरंत ही कॉल काट देना चाहिए और अपने निकटतम साइबर सेल या पुलिस थाने में सूचित करना चाहिए। किसी भी अज्ञात व्यक्ति के साथ बैंक विवरण या ओटीपी साझा करना पूरी तरह से असुरक्षित है। भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए नागरिकों को तकनीक का उपयोग करते समय अत्यधिक सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध कॉल पर घबराकर प्रतिक्रिया न देने की आवश्यकता है। पुलिस प्रशासन द्वारा भी ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए विशेष टीमें गठित की जाती हैं ताकि डिजिटल अपराधियों को जल्द से जल्द पकड़ा जा सके और जनता की मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखा जा सके।

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