नवरात्रि की नवमी पर विशेष धार्मिक आयोजन
मेवाड़, वागड़ और छप्पन-मेवल क्षेत्र के निवासियों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले इस प्राचीन मंदिर में महानवमी पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। यह प्रसिद्ध स्थल भोपा फला इलाके में स्थित है जहाँ सोनार माता जी और भदेरिया भैरूजी का प्राचीन मंदिर बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र स्थल का ऐतिहासिक संबंध सलूम्बर के राजपरिवार के साथ भी जुड़ा रहा है। परंपरा के अनुसार पीढ़ियों से इस क्षेत्र के तमाम श्रद्धालु यहाँ नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने के लिए पहुँचते रहे हैं। नवरात्रि के अवसर पर इस पावन स्थल की रौनक और अधिक बढ़ जाती है। महानवमी की रात को मंदिर परिसर में भव्य रात्रि जागरण की परंपरा का निर्वहन किया गया। रात का समय होने के बावजूद श्रद्धालुओं के आने का ताँता लगातार बना रहा और लोगों ने बढ़-चढ़कर इन आयोजनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
जयकारों और ढोल-नगाड़ों के बीच तम्बोल संपन्न
रात्रि जागरण के दौरान मंदिर परिसर गगनभेदी जयकारों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूँज से गूँज उठा। ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच भव्य तम्बोल का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस विशेष धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने पूरे उत्साह के साथ इसमें अपनी हिस्सेदारी निभाई। मंदिर की सदियों पुरानी परंपराओं को निभाते हुए आयोजन को पूरी भव्यता के साथ संपन्न किया गया। उपस्थित जनसमूह ने भक्ति भाव के साथ अनुष्ठानों में भाग लिया और रात भर चले कार्यक्रमों का हिस्सा बने। व्यवस्थाओं और परंपराओं का पालन करते हुए सभी धार्मिक कृत्य शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण माहौल में पूरे किए गए। इस दौरान पूरे परिसर में उत्सव का माहौल देखने को मिला और हर कोई इस धार्मिक आयोजन का लाभ उठाने के लिए उत्सुक नजर आया।
सरवण स्नान और सरणी नदी की ओर प्रस्थान
मंदिर की स्थापित परंपरा के अनुसार दशमी तिथि के दिन सरवण स्नान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस पावन अवसर पर आसपास के तमाम क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भोपा अपनी पारंपरिक वेशभूषा धारण करके एकत्रित होते हैं। इसके बाद ढोल-नगाड़ों की गूँज और पारंपरिक धुनों के बीच सभी श्रद्धालु सरणी नदी की तरफ प्रस्थान करते हैं। स्थानीय जानकारियों के अनुसार इस विशेष आयोजन में प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। दशमी के दिन जुटने वाली इस भारी भीड़ को लेकर स्थानीय स्तर पर सभी आवश्यक तैयारियाँ और अनुमान लगाए जाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में हिस्सा लेने के लिए दूर-दूर से लोग इस क्षेत्र में आते हैं। नदी पर होने वाले इस स्नान के साथ ही नवरात्रि के इन विशेष धार्मिक उत्सवों का समापन होता है जिससे क्षेत्र की संस्कृति और आस्था दोनों को बल मिलता है।