रामलला का अलौकिक श्रृंगार और दिन की शुरुआत
अक्टूबर महीने की दस तारीख को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि और विक्रम संवत 2082 के पावन दिन पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र अयोध्या धाम में एक विशेष धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ। संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी माने जाने वाले प्रभु श्री रामलला सरकार का अत्यंत अलौकिक और भव्य श्रृंगार किया गया। इस पावन अवसर पर भगवान को प्रतिदिन अलग-अलग रूपों में सजाया जाता है जिससे भक्तों को उनके नए स्वरूप के दर्शन प्राप्त होते हैं। उनके इस विशेष श्रृंगार में उपयोग होने वाली फूलों की मालाओं को विशेष रूप से दिल्ली से मंगाया जाता है। रामलला के दैनिक कार्यक्रमों की शुरुआत सुबह साढ़े छह बजे उनकी पहली आरती के साथ होती है। इस पवित्र अनुष्ठान की शुरुआत भगवान को जगाने की प्रक्रिया से की जाती है जिसके बाद पूजन का क्रम आगे बढ़ता है। इसके बाद प्रभु को लेप लगाने और स्नान करवाने की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है और फिर उन्हें उपयुक्त वस्त्र पहनाए जाते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा हर दिन की स्थिति और मौसम की जरूरतों को ध्यान में रखकर अलग-अलग प्रकार के वस्त्रों का चयन किया जाता है ताकि भगवान को किसी प्रकार की असुविधा न हो और उनका श्रृंगार हमेशा पारंपरिक मर्यादा के अनुकूल ही संपन्न हो सके।
दैनिक पूजन का समय और विशेष वस्त्रों का चयन
भगवान श्री रामलला के दैनिक पूजन और दर्शन की व्यवस्था बेहद अनुशासित तरीके से संचालित की जाती है। मौसम के बदलाव के अनुसार उनके पहनावे में भी विशेष परिवर्तन किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर गर्मियों के मौसम में भगवान को पूरी तरह से सूती और अत्यंत हल्के वस्त्र पहनाए जाते हैं ताकि वे मौसम के अनुकूल रहें। दिनभर के कार्यक्रमों के क्रम में दोपहर के बारह बजे ठीक भोग आरती संपन्न होती है। इसके पश्चात शाम के समय साढ़े सात बजे संध्या आरती का भव्य आयोजन किया जाता है। संध्या आरती के तुरंत बाद रात के आठ बजकर तीस मिनट पर रामलला को शयन कराया जाता है यानी उन्हें विश्राम की मुद्रा में ले जाया जाता है। भक्तों के लिए दर्शन करने की समय सीमा निर्धारित है और श्रद्धालु केवल शाम को साढ़े सात बजे तक ही भगवान के अलौकिक दर्शन कर सकते हैं। इसके अलावा भगवान रामलला को पूरे दिनभर में कुल चार अलग-अलग समय पर भोग अर्पित किया जाता है। इन सभी भोगों की विशेषता यह होती है कि भगवान को हर दिन और हर निश्चित समय के हिसाब से अलग-अलग प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं। इन तमाम व्यंजनों को बाहर से मंगाने के बजाय सीधे राम मंदिर की अपनी रसोई में ही पूरी पवित्रता के साथ तैयार किया जाता है ताकि शुद्धता का पूरा ध्यान रखा जा सके।
मंदिर की रसोई और सुबह की पहली शुरुआत
अयोध्या के इस पावन स्थल पर भगवान श्री रामलला के लिए बनने वाले व्यंजनों की पूरी प्रक्रिया मंदिर परिसर के भीतर ही पूरी की जाती है। मंदिर की रसोई में दक्ष लोगों द्वारा हर पहर और हर भोग के लिए अलग प्रकार की खाद्य सामग्री तैयार की जाती है। सुबह के समय दिन की पहली शुरुआत बाल भोग के साथ होती है जो भगवान को अर्पित किया जाने वाला पहला प्रमुख भोग माना जाता है। इसके बाद दिनभर के अन्य भोग निर्धारित समय सारणी के अनुसार भगवान को परोसे जाते हैं। रामलला के इन तमाम आयोजनों में सनातन परंपरा और नियमों का पूरी तरह से पालन किया जाता है। सुबह की आरती से लेकर रात को शयन तक की हर एक गतिविधि तय समय पर ही होती है। भगवान के लिए आने वाली फूलों की मालाओं से लेकर उनकी पोशाक तक हर चीज की व्यवस्था अत्यंत सावधानी के साथ की जाती है। अयोध्या में आने वाले देश भर के श्रद्धालु इन सभी नियमों और निर्धारित समय के भीतर ही भगवान श्री रामलला के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। मंदिर प्रबंधन और संबंधित ट्रस्ट यह सुनिश्चित करता है कि दर्शनार्थियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो और वे भगवान के इस दिव्य श्रृंगार तथा अलौकिक रूप के दर्शन सुगमता से कर सकें। इस प्रकार अयोध्या धाम में हर दिन एक नए आध्यात्मिक उल्लास के साथ प्रभु की सेवा का यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है।