उत्तर भारत और बंगाल में विजय का उत्सव
उत्तर भारत के अधिकांश इलाकों में यह पर्व रामायण की कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस महान उत्सव के आरंभ होने से नौ दिन पूर्व ही रामलीला का मंचन जोरों पर शुरू हो जाता है और पर्व के मुख्य दिन रावण, मेघनाद तथा कुंभकरण के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है। इन सभी आयोजनों के माध्यम से समाज में बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय का संदेश दिया जाता है। दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल में इस पावन पर्व को विजय दशमी के विशेष रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार लगातार दस दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था, जिसके कारण ही इस दिन को विजय दशमी की संज्ञा दी जाती है। बंगाली समाज की महिलाएं इस दिन सिंदूर खेला की पारंपरिक रस्म को बहुत ही उत्साह के साथ निभाती हैं। इस अनूठी रस्म के दौरान महिलाएं एक-दूसरी के माथे पर सिंदूर लगाकर मां भवानी से अपना आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसी पावन तिथि पर मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा का विसर्जन भी जल स्रोतों में किया जाता है, जिससे यह उत्सव संपन्न होता है।
हिमाचल प्रदेश और मैसूर के शाही आयोजन
हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत पर्वतीय क्षेत्र कुल्लू में यह पर्व बहुत ही निराले और अनूठे ढंग से मनाया जाता है। यहाँ एक सप्ताह तक चलने वाले इस विशाल उत्सव के प्रारंभ में भगवान रघुनाथ की पवित्र मूर्ति को एक सुंदर लकड़ी के रथ में विराजित कर ढालपुर मैदान तक लाया जाता है। इसके पश्चात दो सौ से अधिक संख्या में स्थानीय और ग्राम देवता अपनी सजी-धजी पालकियों में सवार होकर इस भव्य उत्सव में सम्मिलित होने के लिए मैदान में पहुँचते हैं। उधर कर्नाटक के ऐतिहासिक शहर मैसूर में दशहरा बेहद शाही अंदाज में आयोजित किया जाता है। मैसूर का यह प्रसिद्ध दशहरा पूरे दस दिनों तक लगातार चलता है और यह विशेष रूप से देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित होता है। इस भव्य उत्सव की सबसे बड़ी और मुख्य विशेषता प्रसिद्ध जंबू सवारी होती है, जो देखने लायक होती है। इस मनमोहक जुलूस के दौरान एक भव्य रूप से सजाए गए हाथी की पीठ पर रखे सोने के हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को विराजमान किया जाता है और एक विशाल शाही जुलूस निकाला जाता है।
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बस्तर की अनूठी परंपराएं
आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के क्षेत्रों में इस अवसर पर सोना पत्ती की बेहद खास रस्म निभाई जाती है। इस विशेष दिन पर शमी के पवित्र वृक्ष की पूजा-अर्चना की जाती है और उसकी पत्ती को लोग आपस में सोने के प्रतीक के रूप में वितरित करते हैं, इसीलिए इसे सोना पत्ती कहा जाता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में भी इस पर्व को मनाने की शैली बहुत अलग और अनोखी है। बस्तर में आयोजित होने वाला यह पर्व लगभग पचहत्तर दिनों तक लंबी अवधि तक चलता है, लेकिन यहाँ रावण के पुतले का दहन बिल्कुल नहीं किया जाता है। इस अनोखी परंपरा के पीछे बस्तर की लगभग छह सौ साल पुरानी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं मजबूती से जुड़ी हुई हैं। यह पूरा लंबा उत्सव मुख्य रूप से माँ दंतेश्वरी और क्षेत्र के अन्य स्थानीय देवी-देवताओं के आगमन तथा उनकी पूजा-पद्धति से जुड़ा होता है। इस लंबे उत्सव के दौरान बस्तर में अनेक भव्य रथ यात्राएं निकाली जाती हैं और इस पूरे आयोजन में बस्तर के आदिवासी समुदाय से जुड़ी हुई कई प्राचीन रीति-रिवाज तथा परंपराएं स्पष्ट रूप से देखने को मिलती हैं जो दर्शकों को आकर्षित करती हैं।