अतिक्रमण के विरोध में अनूठी पहल और बैठक
उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित पंचमुखी महादेव मंदिर सेवा समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया था। इस विशेष बैठक में मंदिर परिसर से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे अतिक्रमण के गंभीर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई। समिति के सभी सदस्यों ने मिलकर यह तय किया कि इस समस्या का शांतिपूर्ण और धार्मिक तरीके से विरोध दर्ज कराया जाए। इसके तहत झांसी विकास प्राधिकरण के अधिकारियों के पितरों की आत्मा की शांति के लिए विशेष धार्मिक अनुष्ठान कराए जाएंगे। इन अनुष्ठानों में मुख्य रूप से पितृ तर्पण, पारंपरिक पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे कार्यक्रम शामिल किए गए हैं। समिति का कड़ा रुख यह स्पष्ट करता है कि वे अपनी धार्मिक भूमि के संरक्षण के लिए किसी भी रचनात्मक मार्ग को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों का मानना है कि इस अनूठे कदम से संबंधित अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराया जा सकेगा और वे इस पुराने विवाद की तरफ ध्यान देंगे। बैठक में उपस्थित सभी लोगों ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगाई और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तैयार की ताकि विरोध भी हो सके और धार्मिक परंपराओं का पालन भी विधिवत रूप से पूरा किया जा सके।
विवादित भूमि और अनुष्ठान की पूरी रूपरेखा
पंचमुखी महादेव मठ से जुड़ी हुई यह जमीन कुल लगभग छह हजार पांच सौ वर्ग फीट क्षेत्र में फैली हुई है। यह पूरी भूमि सरकारी नजरूल भूमि के अंतर्गत आती है जिस पर पिछले कई वर्षों से लगातार कब्जा बना हुआ है। समिति की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार इस स्थान पर वर्ष दो हजार नौ से अतिक्रमण की बड़ी समस्या चली आ रही है। इसी समस्या के समाधान और अधिकारियों की बुद्धि शुद्धि के लिए आगामी सर्वपितृ अमावस्या का दिन चुना गया है। शहर के प्रसिद्ध लक्ष्मीताल सरोवर के किनारे पूरी विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ यह तर्पण कार्यक्रम संपन्न कराया जाएगा। हालांकि वर्तमान समय में लागू आचार संहिता को पूरी तरह ध्यान में रखा गया है। नियमों का पालन करते हुए समिति ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे भीड़ के रूप में मौके पर इकट्ठा न हों। इसके बजाय सभी लोग अपने अपने घरों में रहकर ही मानसिक सहयोग प्रदान करें और प्रार्थना करें। अधिकारियों के पितरों की शांति और सद्बुद्धि के लिए आयोजित होने वाले इस अनुष्ठान में केवल चुनिंदा लोग ही नियमों के दायरे में रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। समिति ने यह भी सुनिश्चित किया है कि किसी भी प्रकार के सरकारी नियमों का उल्लंघन न हो और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात को उच्चाधिकारियों तक पहुंचाया जा सके।
लंबे समय से लंबित मामला और पूर्व की कार्रवाई
मंदिर की इस बहुमूल्य जमीन और अतिक्रमण के इस पुराने मामले को लेकर पूर्व में भी कई बार प्रशासनिक कदम उठाए जा चुके हैं। झांसी विकास प्राधिकरण द्वारा इस स्थल को लेकर अलग अलग वर्षों में कई बार औपचारिकताएं पूरी की गई थीं। रिकॉर्ड के अनुसार झांसी विकास प्राधिकरण ने वर्ष दो हजार नौ, वर्ष दो हजार बारह और वर्ष दो हजार चौदह में इस भूमि पर कार्रवाई की थी। इसके बाद भी प्रशासनिक स्तर पर लगातार प्रयास जारी रहे और इसी क्रम में वर्ष दो हजार उन्नीस तथा वर्ष दो हजार बीस में भी स्थल को सील किया गया था। इस कड़ी में सबसे हालिया कार्रवाई ग्यारह अगस्त दो हजार छब्बीस को दोहराई गई जब प्राधिकरण ने फिर से सीलिंग की प्रक्रिया पूरी की। इतने लंबे अंतराल और बार बार की गई सीलिंग के बावजूद धरातल पर इस समस्या का कोई भी स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। हर बार कागजी कार्रवाई और सीलिंग के बाद मामला वहीं का वहीं अटका रहता है जिससे मंदिर समिति के लोगों में भारी निराशा और रोष व्याप्त है। बार बार की इन विफलताओं से तंग आकर ही अब समिति ने प्रशासनिक अधिकारियों के पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान का यह अनोखा रास्ता चुना है। इस पूरी पृष्ठभूमि के कारण यह मामला अब स्थानीय स्तर पर एक बड़ी चर्चा का विषय बन गया है जिस पर हर किसी की नजर टिकी हुई है।