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अनूठी परंपरा: सुखपुर में कंधे पर सवार होकर नगर भ्रमण करती हैं मां भगवती

सुखपुर के एक सौ साल पुराने ड्योढ़ी स्थित दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र के दौरान अनोखी रीतियां निभाई जाती हैं। यहां माता की मूर्ति को कंधे पर उठाकर नगर का भ्रमण कराया जाता है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

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Ankit Yadav
21 अक्ट 2026, 13:06
अनूठी परंपरा: सुखपुर में कंधे पर सवार होकर नगर भ्रमण करती हैं मां भगवती

शारदीय नवरात्र पर उमड़ती है भारी भीड़

पवित्र शारदीय नवरात्र के पावन दिनों में ड्योढ़ी स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर परिसर में भक्तों का बहुत बड़ा समूह इकट्ठा होता है। जो भी श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ इस दरबार में अपनी प्रार्थना लेकर आता है, माता उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूरी करती हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर एक सदी का लंबा समय बीत चुका है और समय के साथ इसका रूप भी पूरी तरह बदल चुका है। शुरुआती समय में यह धार्मिक स्थान केवल मिट्टी और खपरैल की छत से ढका हुआ एक साधारण सा कमरा हुआ करता था। बाद में गांव के लोगों और देवी में आस्था रखने वाले सभी श्रद्धालुओं ने मिलकर इसमें अपना पूरा योगदान दिया। सभी के आपसी सहयोग और कठिन प्रयासों के बाद इस स्थान का पूरा कायाकल्प कर दिया गया। अब यह पुरानी इमारत एक विशाल और सुंदर पक्के भवन में पूरी तरह से तब्दील हो चुकी है। इस नई इमारत की अनोखी सुंदरता और चमक हर आने वाले दर्शक का मन मोह लेती है। आज के समय में भी इस पवित्र स्थान पर पूजा-पाठ कराने के सभी पुराने नियम और प्राचीन तौर-तरीके पूरी निष्ठा के साथ निभाए जाते हैं।

सांचे से तैयार होती है अनूठी प्रतिमा

इस विशेष मंदिर में स्थापित की जाने वाली मां भगवती की मूर्ति का रूप और बनावट बाकी सभी जगहों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। पुरानी कहानियों के अनुसार बहुत पहले बंगाल से पाल उपनाम के एक बहुत कुशल और अनुभवी मूर्तिकार यहां आए थे। वही विशेष कारीगर उस समय इस स्थान पर आकर माता की भव्य और सुंदर प्रतिमा को अपने हाथों से तैयार करते थे। जब वह मूर्तिकार अपनी वृद्धावस्था में पहुंचे तब उन्होंने वह पारंपरिक और गुप्त सांचा अपने एक स्थानीय शिष्य को सौंप दिया। वर्तमान समय में उसी शिष्य के परिवार के वंशज पीढ़ी दर पीढ़ी उसी मूल सांचे का इस्तेमाल करके माता की दिव्य प्रतिमा बनाते हैं। यही खास तरीका इस प्राचीन मंदिर को पूरे इलाके में एक अलग और अनूठी पहचान दिलाता है। संबंधित परिवारों से जुड़े सभी सदस्य तय समय से पहले ही मंदिर पहुंच जाते हैं और पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटियों को निभाते हैं। यह पूरी अनुशासित व्यवस्था इस मंदिर के प्रति लोगों की गहरी भक्ति और आपसी सामाजिक मेलजोल का सबसे बेहतरीन उदाहरण सबके सामने रखती है।

नगर भ्रमण और विसर्जन का अलौकिक दृश्य

मंदिर में पूजा के अंतिम चरण में मां की प्रतिमा को कई घंटों तक लगातार नगर भ्रमण कराया जाता है। इस दौरान माता के विसर्जन और यात्रा के सुंदर दृश्य को अपनी आंखों से देखने के लिए जिले भर के हर कोने से लोग पहुंचते हैं। सुखपुर का पूरा इलाका इस दौरान पूरी तरह से भक्ति के रंगों में रंग जाता है और वातावरण पूरी तरह से धार्मिक हो जाता है। नगर भ्रमण के दौरान मां की पवित्र पालकी या स्वरूप को अपने कंधों पर उठाने के लिए भक्तों के बीच बहुत बड़ी होड़ देखने को मिलती है। लोग अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए घंटों तक अपनी बारी आने का बहुत ही बेसब्री के साथ इंतजार करते रहते हैं। इस अनूठे मेले और विसर्जन की पूरी प्रक्रिया को देखने के बाद हर कोई इस सदियों पुरानी परंपरा से मंत्रमुग्ध हो जाता है। बुजुर्गों से चली आ रही इन परंपराओं का आज भी उसी रूप में पालन होना इस स्थान के सांस्कृतिक महत्व को और अधिक मजबूत बनाता है। आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस संस्कृति को संजोकर रखने के लिए पूरी निष्ठा के साथ इन सभी आयोजनों में बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।

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