दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन मंदिरों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान उत्सव के आखिरी दिन शहर के विभिन्न जैन मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा और सभी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए अनुष्ठानों में भाग लिया। इस पावन अवसर पर मुख्य रूप से अभिषेक और शांतिधारा जैसे पवित्र अनुष्ठानों का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में पुरुषों महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। मंदिर परिसरों में गूंजते मंत्रोच्चार और भव्य सजावट ने पूरे वातावरण को पूरी तरह से आध्यात्मिक और ऊर्जावान बना दिया था। आचार्य और विद्वान पंडितों के मार्गदर्शन में संपूर्ण पूजन विधि को अत्यंत अनुशासन और श्रद्धा के साथ संपन्न कराया गया जिससे उपस्थित प्रत्येक भक्त को आत्मीय शांति की अनुभूति हुई। अनुष्ठान के दौरान समाज के लोगों ने एक-दूसरे को पर्व के समापन पर शुभकामनाएं दीं और जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया। इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे ताकि किसी भी श्रद्धालु को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े और सभी अनुष्ठान शांतिपूर्ण तरीके से पूरे हो सकें।
जैन परंपरा में पर्युषण और उत्तम क्षमा का गहरा आध्यात्मिक महत्व भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन में दशलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और संयम का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है जो हर साल भाद्रपद मास के दौरान अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दस दिवसीय अनुष्ठान के दौरान जैन धर्मावलंबी उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव शौच सत्य संयम तप त्याग आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जैसे दस धर्मों का अपने दैनिक जीवन में पालन करने का प्रयास करते हैं। पर्व का प्रत्येक दिन विशेष गुणों और आंतरिक शुद्धि के विकास के लिए समर्पित होता है जिससे मनुष्य अपने भीतर की बुराइयों जैसे क्रोध अहंकार और लोभ पर विजय प्राप्त कर सके। शहर भर के जैन मंदिरों में इस पूरी अवधि के दौरान विशेष स्वाध्याय प्रवचन और सामूहिक पूजन के कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन संस्कृति और उच्च नैतिक मूल्यों से जोड़ना होता है। इस महापर्व के अंतिम दिन यानी अनंत चतुर्दशी के आसपास शहर के सभी जिनागारों में विशेष रौनक देखने को मिलती है और समाज के सभी वर्ग के लोग मिलकर इस आध्यात्मिक उत्सव को पूर्ण उल्लास और गरिमा के साथ मनाते हैं।
समापन समारोह और क्षमावाणी पर्व की ओर बढ़ते कदम महापर्व के इन अंतिम अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद अब जैन समाज क्षमावाणी पर्व की तैयारियों में जुट गया है जो इस पूरी आध्यात्मिक साधना का अगला और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। क्षमावाणी के दिन सभी लोग अपने परिवार मित्रों और परिचितों से मिलकर जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और अपने मन से सभी प्रकार के बैर-भाव को हमेशा के लिए समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार के धार्मिक आयोजन समाज में आपसी प्रेम भाईचारा और सौहार्द की भावना को मजबूत करने का कार्य करते हैं तथा लोगों को नैतिक और सादा जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। मंदिरों और जैन संस्थाओं द्वारा आने वाले दिनों में कई अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तैयार की जा रही है ताकि इस पावर्त्य ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रभाव लंबे समय तक समाज में बना रहे। धार्मिक अनुष्ठानों की इस श्रृंखला से न केवल धार्मिकता का प्रसार होता है बल्कि यह भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त करने का एक बेहतरीन माध्यम भी साबित होती है।