मंदिर निर्माण का लंबा इतिहास और संत की तपस्या
इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की कहानी बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक से जुड़ी है जब सिद्ध संत स्वामी श्री कृष्णानंद परमहंस इस क्षेत्र में पधारे थे। यहां की अलौकिक ऊर्जा से प्रेरित होकर उन्होंने इस स्थान को अपनी साधना का केंद्र बनाया और एक विशेष गुफा में गहरी तपस्या में लीन हो गए। यह गुफा आज भी इस पवित्र मंदिर के परिसर के भीतर सुरक्षित मौजूद है। स्वामी जी के अमूल्य मार्गदर्शन और प्रेरणा के आधार पर ही इस विशाल शिव मंदिर के निर्माण की रूपरेखा तैयार की गई थी। वर्ष 1974 के दौरान इस भव्य धार्मिक संरचना की आधिकारिक नींव रखी गई थी जिसके बाद इसके निर्माण का कार्य आरंभ हुआ। इस विशाल मंदिर को अपने वर्तमान स्वरूप में आने में लगभग 39 लंबे वर्षों का समय लग गया था। निर्माण कार्य की लंबी अवधि के दौरान 10 जुलाई 1983 को स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने अपनी भौतिक यात्रा पूर्ण करते हुए समाधि ले ली थी। उनके ब्रह्मलीन होने के उपरांत मंदिर की प्रबंधन समिति ने निर्माण के कार्य को निरंतर आगे बढ़ाया और अंततः लंबी प्रतीक्षा के बाद वर्ष 2013 में इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरी तरह से संपन्न हो गया। इस प्रकार यह पावन तीर्थ स्थल देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का एक महान केंद्र बन चुका है।
भव्य वास्तुकला और तीन पिरामिडनुमा स्तरों वाला शिखर
इस प्राचीन और भव्य मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत ऊंचा और कलात्मक शिखर है जो दूर से ही पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है। इस विशाल शिखर की संरचना मुख्य रूप से तीन अलग-अलग पिरामिडनुमा स्तरों पर आधारित है जो ऊपर की दिशा में जाने पर क्रमिक रूप से छोटे होते चले जाते हैं। इस वास्तुकला का सबसे निचला और पहला स्तर सबसे अधिक चौड़ाई लिए हुए है जिस पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं। इसके अलावा इस विस्तृत प्रथम स्तर पर प्राचीन पौराणिक कथाओं के दृश्य और अनगिनत प्रकार के सुंदर फूलों के साथ आकर्षक ज्यामितीय डिजाइन भी उकेरे गए हैं। इस शिखर का दूसरा स्तर पहले की तुलना में कुछ अधिक संकरा है और इस पर अप्सराओं तथा गंधर्वों जैसी दिव्य आकृतियों को बहुत बारीकी से गढ़ा गया है। कला प्रेमियों के अनुसार ये सभी दिव्य आकृतियां भारतीय संस्कृति में पवित्रता और आध्यात्मिक ज्ञान का बहुत बड़ा प्रतीक मानी जाती हैं। इस अद्भुत वास्तुकला के बिल्कुल शीर्ष स्तर पर एक पारंपरिक अमलक की स्थापना की गई है जिसके ऊपर एक चमकता हुआ सुनहरा कलश सुशोभित है। यदि इस संपूर्ण वास्तुकला की ऊंचाई की बात की जाए तो इसका मुख्य शिखर लगभग 111 फीट ऊंचा है। इसके साथ ही शीर्ष पर रखे गए पवित्र सुनहरे कलश को मिलाकर इस पूरे मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 122 फीट तक पहुंच जाती है जो इसकी भव्यता में चार चांद लगाती है।
चमत्कारिक कुंड का जल और सामान्य सूचनात्मक निर्देश
इस धार्मिक स्थल के भीतर स्थित एक विशेष कुंड के जल को लेकर श्रद्धालुओं के मन में अटूट विश्वास और गहरी आस्था जुड़ी हुई है। मंदिर आने वाले तमाम भक्तों का ऐसा मानना और कहना है कि इस पावन कुंड का जल पीने से शरीर के कई गंभीर रोग जड़ से समाप्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र जल के भीतर ऐसे विशेष औषधीय गुण प्राकृतिक रूप से मौजूद हैं जो त्वचा संबंधी रोगों को ठीक करने में पूरी तरह सक्षम हैं। हालांकि मंदिर प्रबंधन और जानकारों का यह स्पष्ट रूप से कहना है कि इस लेख में बताए गए सभी प्रकार के उपाय और लाभ केवल सामान्य जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से ही लिखे गए हैं। इस आलेख में शामिल की गई तमाम जानकारियां विभिन्न माध्यमों, ज्योतिषियों, पंचांग, धार्मिक प्रवचनों, पुरानी मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों से संग्रहित की गई हैं। इसलिए सभी पाठकों से यह विनम्र अनुरोध किया जाता है कि वे इस जानकारी को किसी प्रकार का अंतिम सत्य या अकाट्य दावा न मानें। इस प्रकार के धार्मिक और पारंपरिक विषयों से जुड़े मामलों में पाठकों को हमेशा अपने स्वयं के विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी से बचा जा सके।