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हरतालिका तीज व्रत: सुहागिन महिलाओं के लिए पूजा सामग्री और विधि की पूरी जानकारी
सनातन संस्कृति में हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें विधि-विधान से पूजा कर महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
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Ankit Yadav
13 सित 2026, 14:07
सनातन परंपरा के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व रखता है। साल 2026 में आ रहे इस पावन पर्व को लेकर महिलाओं में काफी उत्साह देखा जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए कठोर निर्जला उपवास रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए की थी, तभी से यह परंपरा चली आ रही है। व्रत के दौरान नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है और पूरे दिन बिना पानी के रहकर भगवान की आराधना की जाती है।
पूजा सामग्री और आवश्यक वस्तुएं
हरतालिका तीज के पावन अवसर पर पूजा की थाली तैयार करते समय कुछ विशेष सामग्रियों का होना अनिवार्य माना गया है। पूजन सामग्री में मुख्य रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मिट्टी या बालू से बनी प्रतिमाएं शामिल की जाती हैं। इसके अलावा पूजा के लिए सुहाग की पिटारी का विशेष महत्व है, जिसमें सिंदूर, महावर, चूड़ियां, बिछिया, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा और नए वस्त्र जैसी सुहाग की सोलह चीजें रखी जाती हैं। साथ ही पूजा के लिए केले के पत्ते, जनेऊ, कलावा, धूप, दीप, कपूर, घी, अगरबत्ती, फल, फूल, बेलपत्र, शमी के पत्ते, धतूरा, भांग और नैवेद्य के रूप में विभिन्न प्रकार की मिठाइयां या पकवान एकत्रित किए जाते हैं। इन सभी सामग्रियों को एक साफ चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर व्यवस्थित किया जाता है ताकि अनुष्ठान में किसी प्रकार की बाधा न आए।
व्रत की विधि और नियम
इस व्रत की विधि बेहद कठिन और पवित्र मानी जाती है जो सूर्योदय से शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक चलती है। व्रती महिलाओं को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने होते हैं और इसके बाद मन में व्रत का संकल्प लिया जाता है। प्रदोष काल के समय भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा की जाती है, जिसमें षोडशोपचार पूजा पद्धति का पालन किया जाता है। पूजा के दौरान हरतालिका तीज की कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य माना जाता है, जिसके बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। रात्रि जागरण करते हुए कीर्तन और भजन गाने का भी विशेष विधान है। अगले दिन सुबह पूजा-अर्चना संपन्न करने और हवन करने के बाद ही महिलाएं अन्न और जल ग्रहण कर अपना व्रत खोलती हैं, जिसे पारण कहा जाता है।
धार्मिक जानकारों का मानना है कि इस पर्व से न केवल पारिवारिक सुख-शांति बनी रहती है बल्कि आपसी प्रेम और समर्पण की भावना भी मजबूत होती है। छत्तीसगढ़ समेत देश के विभिन्न हिस्सों में इस दिन बाजारों में खासी रौनक देखने को मिलती है जहां महिलाएं पूजा का सामान और नए वस्त्र खरीदने के लिए पहुंचती हैं। इस प्रकार यह पर्व भारतीय संस्कृति की उन महान परंपराओं को जीवंत रखता है जो रिश्तों में अटूट विश्वास और पवित्रता का संदेश देती हैं।