शारदीय नवरात्र पर काशी में भव्य आयोजन
धर्म नगरी काशी में 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ होने जा रहा है। इस पावन पर्व के आगमन के साथ ही संपूर्ण शहर में मां दुर्गा के पूजनोत्सव की तैयारियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। विभिन्न क्षेत्रों में आकर्षक और भव्य पंडालों का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। इसी क्रम में हथुआ मार्केट स्थित प्रीमियर बॉयज क्लब द्वारा एक अनूठी पहल की जा रही है। क्लब की ओर से इस बार विश्व प्रसिद्ध कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की एक विशाल प्रतिकृति तैयार की जा रही है। इस पंडाल के अंदर मां दुर्गा की लगभग 12 फीट ऊंची प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा। माता की यह प्रतिमा पूरी तरह से सौम्य और शांत स्वरूप में होगी। इस भव्य निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए पश्चिम बंगाल से आए लगभग 50 कुशल कारीगर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कारीगरों की अलग-अलग टीमें विभिन्न शिफ्टों में काम बांटकर पंडाल को अंतिम रूप देने में जुटी हुई हैं। इस निर्माण कार्य की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले करीब दो महीनों से लगातार पंडाल को खड़ा करने का काम चल रहा है। इस वर्ष हथुआ मार्केट के इस प्रसिद्ध पंडाल की सजावट की जिम्मेदारी में भी बदलाव किया गया है। साल 1980 से लगातार सजावट का कार्य संभालने वाले कानू बाबू डेकोरेटर्स इस बार इस आयोजन से नहीं जुड़े हैं। उनकी जगह पर इस बार किरण डेकोरेटर्स को पंडाल की सजावट का ठेका सौंपा गया है। क्लब के पदाधिकारियों के अनुसार इस विशाल पंडाल में आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए मां दुर्गा के दर्शन सप्तमी तिथि से प्रारंभ हो जाएंगे।
निर्माण कार्य में उपयोग सामग्री और रूपरेखा
प्रीमियर बॉयज क्लब के पदाधिकारी शुभम सिंह ने इस भव्य आयोजन के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि क्लब का मुख्य उद्देश्य हर साल देश-विदेश के प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों की प्रतिकृतियों के माध्यम से सनातन संस्कृति को बढ़ावा देना है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस बार अंकोरवाट मंदिर के प्रारूप को चुना गया है। इस पूरे ढांचे को खड़ा करने में भारी मात्रा में सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है। निर्माण स्थल पर अब तक करीब 10 हजार बांस-बल्लियों का प्रयोग किया जा चुका है। इसके अलावा ढांचे को मजबूती देने के लिए 20 किलोग्राम से ज्यादा कीलों का उपयोग किया गया है। पंडाल का आकार इतना बड़ा और विशाल रखा गया है कि एक ही समय में लगभग 10 हजार श्रद्धालु आसानी से मां दुर्गा के दर्शन कर सकेंगे। पंडाल के भीतर स्थापित की जाने वाली देवी दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण भी स्थानीय स्तर पर काशी में ही किया जा रहा है। इस प्रतिमा को अंकोरवाट मंदिर की मूल थीम के बिल्कुल अनुरूप तैयार किया जा रहा है, जिससे मंदिर और प्रतिमा के बीच एक अद्भुत सामंजस्य दिखाई दे। प्रतिमा को सौम्य और खड़ी हुई मुद्रा में रखा जाएगा, जो देखने में अत्यंत आकर्षक और भव्य प्रतीत होगी। कारीगरों द्वारा इस विशाल संरचना को सुरक्षित और सुंदर बनाने के लिए हर बारीक बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। क्लब के सदस्य लगातार निर्माण कार्य की निगरानी कर रहे हैं ताकि समय रहते सभी काम पूरे हो जाएं और श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
ऐतिहासिक अंकोरवाट मंदिर का पौराणिक महत्व
कंबोडिया में स्थित अंकोरवाट मंदिर दुनिया भर में अपनी अनूठी वास्तुकला और विशालता के लिए विख्यात है। मूल रूप से इस प्राचीन मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर के रूप में किया गया था। करीब 800 साल पुराने इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण राजा सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल के दौरान कराया गया था। हालांकि बाद के दौर में यह बौद्ध धर्म के प्रमुख और पवित्र धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया। यह पूरा मंदिर परिसर लगभग 500 एकड़ के विशाल भूभाग में फैला हुआ है और चारों तरफ से एक बहुत मजबूत चहारदीवारी से घिरा है। मंदिर की वास्तुकला खमेर शास्त्रीय शैली से अत्यधिक प्रभावित है, जो इसकी भव्यता को और अधिक बढ़ा देती है। इस मंदिर के केंद्रीय परिसर में कमल के आकार के कुल पांच प्रमुख शिखर या गुंबद बने हुए हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार इन शिखरों को मेरु पर्वत का सीधा प्रतीक माना जाता है। मंदिर की दीवारों पर हिंदू धर्मग्रंथों और विभिन्न पौराणिक कथाओं से जुड़े प्रसंगों की अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर नक्काशी की गई है। बाद के समय में इस परिसर में बौद्ध धर्म से जुड़ी कलाकृतियों और दृश्यों को भी उचित स्थान दिया गया। अपनी अद्भुत संरचना और जटिल नक्काशी के बल पर अंकोरवाट को दुनिया का आठवां अजूबा भी कहा जाता है। वर्तमान में यह ऐतिहासिक स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और वैश्विक स्तर पर पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र बना हुआ है।