आज से शुरू हुआ पितृ पक्ष का अनुष्ठान भारतीय पंचांग और धार्मिक परंपराओं के अनुसार आज से पितृ पक्ष का शुभारंभ हो गया है जिसके तहत लोग अपने पूर्वजों को याद कर रहे हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा-पाठ का आयोजन कर रहे हैं। इस अवधि के दौरान हिन्दू परिवारों में वे सभी धार्मिक कर्मकांड पूरे किए जाते हैं जिनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है ताकि दिवंगत आत्माओं को संतुष्टि प्राप्त हो सके। सुबह सवेरे स्नान के पश्चात लोग तर्पण और पिंडदान की प्रक्रियाओं में जुट जाते हैं जिससे उनकी आने वाली पीढ़ियों पर पितरों का आशीर्वाद बना रहे। इस विशेष समय-चक्र में देश भर के विभिन्न धार्मिक स्थलों और नदी तटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं और अपने कुल के पूर्वजों के निमित्त दान-पुण्य के कार्य करते हैं। पंचांग की गणना के अनुसार यह पूरा कालखंड पितरों को समर्पित होता है और इसमें किसी भी नए मांगलिक कार्य की शुरुआत वर्जित मानी जाती है ताकि पूरा ध्यान केवल दिवंगत आत्माओं के स्मरण और उनके प्रति आभार जताने पर केंद्रित रहे।
धार्मिक मान्यताएं और श्राद्ध के जरूरी नियम शास्त्रों में पितृ पक्ष के दौरान पालन किए जाने वाले कई कड़े नियमों और विधियों का विस्तार से वर्णन मिलता है जिनका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा प्रकट करना है। इस पूरे पखवाड़े में लोग अपने घरों में सात्विक भोजन तैयार करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ गाय, कौए और कुत्ते के लिए भी ग्रास निकालते हैं जिसे पंचबलि कर्म कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार इन जीवों के माध्यम से अर्पित किया गया भोजन सीधे हमारे पूर्वजों तक पहुंचता है और उन्हें तृप्ति प्रदान करता है। इसके अलावा इस दौरान बाल कटवाने, नाखून काटने और नए वस्त्र खरीदने जैसी गतिविधियों से परहेज करने की पुरानी परंपरा चली आ रही है ताकि मन पूरी तरह से संयमित और अनुशासन में रहे। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा पूरी निष्ठा और विधि-विधान के साथ तर्पण किया जाता है जिसमें जल, तिल और कुशा का विशेष प्रयोग होता है। इन सभी धार्मिक क्रिया-कलापों का मुख्य उद्देश्य अपने मूल से जुड़ना और उन पूर्वजों को नमन करना है जिनके बल पर आज वर्तमान पीढ़ी का अस्तित्व संभव हो पाया है।
तिथि सूची और तर्पण विधि का महत्व पितृ पक्ष के दौरान आने वाली विभिन्न तिथियों का अपना अलग महत्व होता है और प्रत्येक तिथि पर उसी दिन दिवंगत हुए परिजनों का श्राद्ध करने का विधान है। यदि किसी को अपने किसी परिजन की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो ऐसी स्थिति में सर्व पितृ अमावस्या के दिन तर्पण करने का प्रावधान शास्त्रों में बताया गया है जो इस पूरे अनुष्ठान का अंतिम दिन होता है। तर्पण विधि को पूर्ण करने के लिए विद्वान पंडितों की सहायता ली जाती है जो मंत्रोच्चार के साथ सभी कर्मकांडों कोली भांति संपन्न कराते हैं ताकि अनुष्ठान में किसी प्रकार की त्रुटि न रह जाए। इन दिनों में लोग अपने पूर्वजों के नाम पर गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र दान करते हैं जिसे बहुत बड़ा पुण्य माना जाता है। इस प्रकार यह पूरा पखवाड़ा केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह परिवार की एकता, संस्कारों के आदान-प्रदान और अपनी समृद्ध संस्कृति के प्रति निष्ठा बनाए रखने का एक सशक्त माध्यम भी साबित होता है।