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बड़ा सवाल: मुफ्त राशन पाने वाली अस्सी करोड़ आबादी कैसे कराएगी बच्चों की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई
देश में मुफ्त राशन योजनाओं और शिक्षा व्यवस्था के भारी भरकम खर्च के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि आर्थिक तंगी से जूझते हुए अस्सी करोड़ लोग अपने बच्चों को महंगे निजी संस्थानों में कैसे पढ़ाएंगे।
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Ankit Yadav
11 सित 2026, 13:05
हाल ही में देश के प्रमुख मीडिया मंचों और बहसों में यह सवाल जोर-शोर से उठाया गया है कि क्या सरकारी योजनाओं के सहारे जीवन बसर करने वाले परिवार गुणवत्तापूर्ण और महंगी शिक्षा का खर्च उठाने में सक्षम हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा के बढ़ते कमर्शियलकरण और आम आदमी की घटती क्रय शक्ति पर लगातार चिंता जताई जा रही है। जब बुनियादी जरूरतों के लिए भी सरकारी सहायता पर निर्भर रहना पड़े, तब बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए भारी-भरकम फीस भरने का सपना देखना कैसे मुमकिन हो सकता है, इस पर समाज के विभिन्न वर्गों से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
बढ़ता शिक्षा का खर्च और आमदनी की खाई
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की एक बहुत बड़ी आबादी यानी लगभग अस्सी करोड़ लोग आज भी सब्सिडी वाले अनाज या मुफ्त राशन के जरिए अपना गुजारा कर रहे हैं। ऐसे में उनके परिवारों के सामने दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना ही सबसे बड़ी चुनौती बना रहता है। जब बुनियादी जीविका के लाले पड़े हों, तब राजधानी लखनऊ जैसे शहरों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक में प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस, यूनिफॉर्म और किताबों का खर्चा वहन करना असंभव सा प्रतीत होता है। इस स्थिति के कारण शिक्षा का अधिकार और सबको समान शिक्षा देने का दावा धरातल पर कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
राजधानी लखनऊ के अभिभावक संघों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी यही कहना है कि निजी शिक्षण संस्थानों में जिस तरह से फीस में लगातार इजाफा हो रहा है, उसने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है। मुफ्त राशन योजना यह तो सुनिश्चित करती है कि किसी का पेट भूखा न रहे, लेकिन यह भविष्य की पीढ़ी को उज्ज्वल करियर या तकनीकी और उच्च शिक्षा दिलाने की गारंटी नहीं देती। सरकारी स्कूलों की हालत में सुधार लाने के दावे तो तमाम किए जाते हैं, परंतु ज़मीनी हकीकत आज भी इन दावों से कोसों दूर नजर आती है, जिसके कारण अभिभावक मजबूरी में कर्ज लेकर या अपनी जमा पूंजी खर्च करके बच्चों को पढ़ाने का प्रयास करते हैं।
आने वाले समय में नीति निर्माताओं और सरकार के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वे सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को इतना मजबूत बनाएं कि गरीब से गरीब व्यक्ति का बच्चा भी बिना किसी आर्थिक बोझ के उच्च स्तर की तालीम हासिल कर सके। जब तक सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार नहीं लाया जाता, तब तक इस अस्सी करोड़ आबादी के लिए अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने का सपना एक दूर की कौड़ी ही बना रहेगा। इस संवेदनशील विषय पर अब राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ शैक्षणिक हलकों में भी व्यापक मंथन शुरू हो चुका है ताकि देश के भविष्य को अंधकार से बचाया जा सके।