मुंबई में आज फिल्म प्रदर्शक संघ की एक आपात बैठक हुई, जिसमें बड़े बजट की फिल्मों के टिकट मूल्य और राजस्व बंटवारे के नए नियमों पर चर्चा की गई। सिनेमा मालिकों का कहना है कि ओटीटी प्लेटफार्मों के बढ़ते प्रभुत्व के बीच, सिनेमाघरों को बचाए रखने के लिए निर्माताओं को अपनी शर्तों में लचीलापन लाना होगा। कई थिएटर मालिकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे आने वाली बड़ी फिल्मों को रिलीज करने से मना कर सकते हैं। यह विवाद पिछले कुछ महीनों से चल रहा है, लेकिन अब स्थिति गंभीर हो गई है।
ओटीटी बनाम सिनेमाघर
इस बहस के पीछे मुख्य कारण ओटीटी पर फिल्मों की जल्दी रिलीज होना है। सिनेमा मालिकों का तर्क है कि थिएटर में रिलीज के कम से कम आठ सप्ताह बाद ही फिल्मों को ओटीटी पर आना चाहिए ताकि दर्शकों को सिनेमाघर आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। निर्माताओं का मानना है कि वे व्यापारिक सुरक्षा के लिए ओटीटी सौदों पर अधिक निर्भर हैं, जो फिल्म निर्माण की लागत को कवर करने में मदद करते हैं। यह टकराव पूरी फिल्म बिरादरी को दो हिस्सों में बांट रहा है, जहां कलाकार भी अब अपनी राय साझा कर रहे हैं।
नया समझौता और रास्ता
आगामी दिनों में फिल्म निर्माता संघ और प्रदर्शकों के बीच एक उच्च-स्तरीय वार्ता होने की संभावना है। उद्योग विशेषज्ञों का सुझाव है कि एक हाइब्रिड मॉडल तैयार किया जाना चाहिए, जो दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे। दर्शकों के लिए तो मुख्य चिंता अच्छी सामग्री है, और उन्हें डर है कि इस विवाद के कारण फिल्मों की रिलीज में देरी न हो जाए। बॉलीवुड की साख बनाए रखने के लिए अब एक मध्यम मार्ग निकालना अनिवार्य है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा का दौर पहले से ही काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।