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सदाबहार धुन: बयालीस साल पुराना लोकप्रिय गाना आज भी शादियों में जूता चुराई की रस्म की है जान

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे गीत दर्ज हैं जो रिलीज के दशकों बाद भी दर्शकों के दिलों पर राज करते हैं। ऐसा ही एक बयालीस साल पुराना गाना आज भी भारतीय शादियों और विशेष तौर पर जूता चुराई की रस्म के दौरान सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है।

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Ankit Yadav
23 अग 2026, 11:41
सदाबहार धुन: बयालीस साल पुराना लोकप्रिय गाना आज भी शादियों में जूता चुराई की रस्म की है जान
भारतीय फिल्म उद्योग का सफर अनगिनत यादगार धुनों और सदाबहार गीतों से भरा पड़ा है। इनमें से कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं जो केवल पर्दे पर ही नहीं बल्कि लोगों के निजी जीवन और सांस्कृतिक उत्सवों का भी एक अभिन्न हिस्सा बन जाती हैं। आज से बयालीस साल पहले रिलीज हुआ एक ऐसा ही खास गाना आज भी हर पीढ़ी के बीच अपनी खास जगह बनाए हुए है। जब भी इस गीत की गूंज सुनाई देती है, तो लोगों के जहन में तुरंत ही भारतीय विवाह समारोहों की वह खूबसूरत और नटखट तस्वीरें ताजा हो जाती हैं जो इस संस्कृति की असली पहचान हैं।

शादियों की रौनक बढ़ाने वाला संगीत

इस लोकप्रिय गीत के बोल और इसकी धुन ने अपने समय में सिनेमाघरों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगवा दी थीं। लोग इस फिल्म को देखने के लिए बेताब रहते थे और इसका संगीत लोगों के जुबान पर चढ़ गया था। समय बीतने के साथ फिल्मों का दौर बदला, नए गाने आए और गए, लेकिन इस विशेष गीत की चमक फीकी नहीं पड़ी। आज के दौर में जब भी शादियों का सीजन आता है, तो यह गाना डीजे से लेकर पारिवारिक महफिलों तक हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह आज के दौर के युवाओं और बुजुर्गों दोनों को ही झूमने पर मजबूर कर देता है।

जूता चुराई की अनूठी रस्म और जीजा-साली की नोकझोंक

विवाह समारोहों में होने वाली रस्मों में जूता चुराई का कार्यक्रम सबसे अधिक मनोरंजक और उत्साह से भरा माना जाता है। इस दौरान दूल्हे के जूते चुराने और उसके बदले में नेग या शगुन की मांग करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इस पूरी प्रक्रिया में जीजा और सालियों के बीच होने वाली मीठी नोंकझोंक और हंसी-मजाक इस उत्सव के माहौल में चार चांद लगा देते हैं। बयालीस साल पुराना यह प्रतिष्ठित गाना ठीक इसी पारिवारिक और खुशनुमा माहौल को बयां करता है। इसमें जिस प्रकार से रिश्ते की मिठास और हल्की-फुल्की तकरार को दर्शाया गया है, वह आज भी शादियों में इस रस्म के दौरान बैकग्राउंड स्कोर के रूप में सबसे पहली पसंद बना हुआ है। संस्कृति और आधुनिकता के इस अनूठे संगम ने यह साबित कर दिया है कि बेहतरीन कला कभी पुरानी नहीं होती। आने वाले समय में भी इस तरह के सांस्कृतिक रूप से जुड़े गीत भारतीय आयोजनों का हिस्सा बने रहेंगे और लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरते रहेंगे।
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