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सिनेमा की नई उड़ान: झारखंड फिल्म इंडस्ट्री को वैश्विक पहचान दिलाने की उठी मांग
झारखंड के फिल्म उद्योग को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाने के लिए अब ज़मीनी स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है, और इसी दिशा में असीम सिन्हा ने गांवों तक सिनेमा का माहौल मजबूत करने पर जोर दिया है।
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Ankit Yadav
24 अग 2026, 16:53
झारखंड में कला, संस्कृति और प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यहां के सिनेमा जगत को वह मुकाम हासिल नहीं हो पाया है जिसका वह असल हकदार है। हाल ही में सामने आए बयानों के अनुसार, अब समय आ गया है कि झारखंड के फिल्म उद्योग को केवल स्थानीय सीमाओं तक सीमित न रखकर वैश्विक पटल पर स्थापित किया जाए। इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत है ताकि राज्य के युवाओं की छिपी हुई प्रतिभा को पूरी दुनिया देख सके। सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह किसी भी क्षेत्र की संस्कृति, भाषा और सामाजिक ताने-बाने को दुनिया के सामने रखने का एक बहुत सशक्त माध्यम भी है।
गांवों तक सिनेमाई संस्कृति का विस्तार
असीम सिन्हा ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि जब तक सिनेमा का माहौल राज्य के सुदूर गांवों और कस्बों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक एक मजबूत और आत्मनिर्भर फिल्म इंडस्ट्री का सपना पूरा नहीं हो सकता है। झारखंड के गांवों में लोक कला, पारंपरिक संगीत और अनकही कहानियां प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। यदि इन ग्रामीण जड़ों को मुख्यधारा के सिनेमा के साथ जोड़ा जाए, तो न केवल मौलिक कथाओं का सृजन होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। ग्रामीण इलाकों में छोटे पैमाने पर थियेटर संस्कृति को बढ़ावा देना, नुक्कड़ नाटक और स्थानीय फिल्म स्क्रीनिंग जैसे आयोजनों से इस दिशा में एक ठोस नींव रखी जा सकती है।
क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों को बढ़ावा देना भी इस पूरी प्रक्रिया का एक बेहद अहम हिस्सा है। जब तक दर्शक अपनी मातृभाषा में बनी फिल्मों से जुड़ाव महसूस नहीं करेंगे, तब तक सिनेमा जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सकता। इसके लिए राज्य के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों को अपनी कहानियों में स्थानीय परिवेश, रीति-रिवाजों और रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाइयों को करीने से पिरोना होगा। इससे न केवल दर्शकों का एक नया वर्ग तैयार होगा, बल्कि झारखंडी सिनेमा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी एक विशिष्ट पहचान मिल सकेगी।
भविष्य की संभावनाएं और चुनौतियां
हालांकि इस सफर में कई तरह की चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं, जैसे बुनियादी ढांचे की कमी, वित्तीय सहायता का अभाव और उचित विपणन (मार्केटिंग) रणनीतियों की जानकारी न होना। इन समस्याओं से पार पाने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर समन्वय स्थापित करना बेहद आवश्यक है। यदि राज्य सरकार फिल्म नीति को और अधिक उदार और व्यावहारिक बनाए, तो देश-विदेश के बड़े निवेशक और निर्माता भी झारखंड की ओर आकर्षित होंगे। इसके अलावा, स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों के लिए विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे तकनीकी रूप से दक्ष हो सकें।
आने वाले दिनों में यदि इन सभी बिंदुओं पर गंभीरता से अमल किया गया, तो झारखंड फिल्म इंडस्ट्री देश के नक्शे पर एक चमकते हुए सितारे के रूप में उभर सकती है। असीम सिन्हा द्वारा उठाया गया यह मुद्दा वास्तव में उन सभी लोगों के लिए एक आंख खोलने वाला संदेश है जो इस क्षेत्र की तरक्की चाहते हैं। अब वक्त आ गया है कि सिर्फ कागजी योजनाओं की बजाय धरातल पर ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि झारखंड का सिनेमा सचमुच ग्लोबल मंच पर अपनी अमिट छाप छोड़ सके।