नेत्र स्वास्थ्य का गंभीर संकट
झारखंड राज्य के भीतर चार करोड़ ग्यारह लाख की कुल आबादी के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी मात्र 52 नेत्र चिकित्सकों के कंधों पर टिकी है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की जनता का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की आंखों की बीमारियों से ग्रसित है और करीब चार लाख लोग मोतियाबिंद की समस्या का सामना कर रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य की लगभग 2.1 प्रतिशत जनसंख्या को समय पर इलाज की सख्त आवश्यकता है। यह समस्या केवल मोतियाबिंद तक ही सीमित नहीं है बल्कि ग्लूकोमा और नजर की कमजोरी जैसी अन्य बीमारियां भी लोगों को अंधापन की ओर ले जा रही हैं। रांची के सदर अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या यह दर्शाती है कि दूरदराज के इलाकों में जागरूकता का घोर अभाव बना हुआ है। कई ऐसे बुजुर्ग मरीज वर्षों से धुंधली दृष्टि के साथ जी रहे हैं क्योंकि उन्हें उपचार की उपलब्धता की जानकारी ही नहीं थी। राज्य का स्वास्थ्य ढांचा इस विशाल चुनौती को हल करने के लिए निरंतर काम कर रहा है।
इलाज और जागरूकता की पहल
स्वास्थ्य विभाग द्वारा राज्य के विभिन्न जिलों में नेत्र स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। पंकज कुमार ने स्पष्ट किया है कि अंधापन नियंत्रण कार्यक्रम के तहत नेत्रदान को बढ़ावा देना एक प्राथमिकता है क्योंकि एक व्यक्ति का नेत्रदान कम से कम दो लोगों की जिंदगी में नई रोशनी भर सकता है। पहले राज्य में सिर्फ रिम्स के पास आई बैंक की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन अब जमशेदपुर और धनबाद के मेडिकल कॉलेजों में भी इसे पंजीकृत किया गया है। धनबाद के एक डॉक्टर को विशेष प्रशिक्षण के लिए दिल्ली के एम्स संस्थान भी भेजा गया है ताकि वे कॉर्निया ट्रांसप्लांट जैसी जटिल प्रक्रियाओं में महारत हासिल कर सकें। रांची में आयोजित हालिया नेत्र चिकित्सकों के महाकुंभ में देशभर के एक हजार से अधिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल मोतियाबिंद के बैकलॉग को समाप्त करना नहीं, बल्कि भविष्य में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस जैसी समस्याओं का समय पर निदान सुनिश्चित करना भी है।
मरीजों के अनुभव और भविष्य की राह
रांची के बेड़ो क्षेत्र की कुंवारी कुजूर की कहानी उन लाखों लोगों की व्यथा बयान करती है जो जानकारी न होने के कारण वर्षों तक अंधेरे में रहने को मजबूर होते हैं। वह पिछले चार-पांच सालों से अपनी आंखों की धुंधली दृष्टि से परेशान थीं, लेकिन निशुल्क इलाज की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने सदर अस्पताल में अपना ऑपरेशन करवाया। ठीक होने के बाद अब वह अपने पति को भी अस्पताल लाकर उनका उपचार करवाने के लिए प्रेरित हैं, जिन्हें भी दृष्टि संबंधी परेशानी है। विशेषज्ञ प्रीतेश प्रनॉय के अनुसार, जब मरीज ऑपरेशन के बाद स्पष्ट देख पाते हैं, तो वे अपने परिवार और गांव के अन्य लोगों को भी अस्पताल आने का संदेश देते हैं, जिससे जागरूकता की एक नई श्रृंखला शुरू होती है। राज्य सरकार ने पिछले पांच वर्षों में दस लाख से अधिक ऑपरेशन करके बैकलॉग को घटाने का सार्थक प्रयास किया है। भविष्य में कॉर्निया ट्रांसप्लांट और आधुनिक सुविधाओं से लैस नेत्र विभाग के माध्यम से इस चुनौती पर पूरी तरह काबू पाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।