मैनपुर में वायरल फीवर का प्रकोप
मैनपुर ब्लॉक और उसके आसपास के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में इस समय मौसमी बीमारियों का व्यापक प्रभाव देखा जा रहा है। बड़ी संख्या में लोग बदन दर्द, तेज बुखार, कमजोरी और वायरल संक्रमण जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। इन क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की निर्धारित समय-सीमा आम जनता के लिए बड़ी बाधा साबित हो रही है। वर्तमान में मैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र समेत अन्य प्राथमिक केंद्रों पर ओपीडी सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे और शाम 4 बजे से 5:30 बजे तक संचालित होती है। इस बीच दोपहर के समय अस्पताल बंद रहने के कारण गंभीर रूप से बीमार लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। दुर्घटना या अचानक बिगड़ी तबीयत की स्थिति में मरीज को शाम की शिफ्ट शुरू होने तक इलाज से वंचित रहना पड़ता है। दूरदराज के इलाकों से बड़ी मुश्किल से संसाधन जुटाकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों के लिए यह मध्यांतर का समय किसी सजा से कम नहीं है।
अवैध चिकित्सकों पर ग्रामीणों की निर्भरता
सरकारी अस्पतालों में निर्धारित ओपीडी घंटों के दौरान सेवाएं न मिलने का सीधा लाभ गांव-गांव में सक्रिय झोलाछाप डॉक्टर उठा रहे हैं। जब गरीब ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर ओपीडी पर ताला देखते हैं, तो वे अपनी व्यथा कम करने के लिए इन झोलाछाप चिकित्सकों की शरण लेने को विवश हो जाते हैं। बिना किसी वैध डिग्री या चिकित्सकीय योग्यता के ये कथित डॉक्टर घर-घर जाकर मरीजों को उच्च क्षमता वाली एंटीबायोटिक दवाएं और इंजेक्शन देने का काम कर रहे हैं। गरियाबंद जिले के अमलीपदर क्षेत्र में हाल ही में सामने आए गलत इलाज के गंभीर मामलों के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच का आश्वासन दिया था, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति नहीं बदली है। आज भी स्थानीय आदिवासी अंचलों में झोलाछापों का नेटवर्क बेधड़क संचालित हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग के नियमों के अनुसार ओपीडी की दो शिफ्टें तय हैं, लेकिन मौसमी बीमारियों के मौजूदा दौर में इस कठोर व्यवस्था को लचीला नहीं बनाने का खामियाजा गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
स्वास्थ्य ढांचे में सुधार की मांग
मैनपुर ब्लॉक के सुदूर आदिवासी गांवों में स्थित आयुष्मान आरोग्य केंद्रों की बदहाली ने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। अधिकांश आरोग्य केंद्र नियमित रूप से नहीं खुलते हैं, जिससे प्राथमिक उपचार के लिए ग्रामीणों को ब्लॉक मुख्यालय तक की लंबी दौड़ लगानी पड़ती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों ने मांग की है कि वायरल फीवर के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए ओपीडी के समय में तत्काल ढील दी जाए और दोपहर के समय भी डॉक्टरों की उपस्थिति अनिवार्य की जाए। साथ ही, बंद रहने वाले आरोग्य केंद्रों और वहां पदस्थ कर्मचारियों की आकस्मिक जांच की जानी चाहिए ताकि जवाबदेही तय हो सके। गांव-गांव जाकर मरीजों के जीवन से खिलवाड़ करने वाले डिग्रीहीन झोलाछापों के खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाकर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जानी अत्यंत आवश्यक है। जब तक स्थानीय स्तर पर ही मरीजों को सही इलाज नहीं मिलता और अस्पताल में ओपीडी समय पर उपलब्ध नहीं होती, तब तक यह स्वास्थ्य संकट और अधिक गहरा होता जाएगा।