मसालों में जहर की मिलावट और बढ़ते मामले दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली हल्दी और अन्य मसालों में सीसा यानी लेड जैसे जहरीले तत्वों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया है कि हमारी थाली तक पहुंचने वाला भोजन कितना असुरक्षित हो चुका है। हाल के दिनों में पटना से लेकर झारखंड के विभिन्न बाजारों तक खाद्य मिलावट के कई ऐसे प्रकरण सामने आए हैं जिन्होंने नियामक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। हल्दी पावडर में कृत्रिम रंग और भारी धातुओं का मिश्रण सीधे तौर पर मानव तंत्रिका तंत्र और गुर्दे को प्रभावित कर रहा है। एमडीएच और एवरेस्ट जैसे प्रतिष्ठित मसाला ब्रांडों से जुड़े हालिया विवादों ने उपभोक्ताओं के मन में यह आशंका पैदा कर दी है कि वे अपने परिवार को पोषण दे रहे हैं या धीमा जहर खिला रहे हैं। बाजार में बिकने वाले इन उत्पादों की गुणवत्ता पर से लोगों का भरोसा तेजी से उठ रहा है और हर कोई यह सोचने पर मजबूर है कि आखिर रसोई घर में रखी सामग्री इतनी दूषित कैसे हो सकती है।
व्यापक प्रशासनिक लापरवाही और बाजार की अनदेखी खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के बावजूद देश भर के बाजारों में जिस प्रकार खुलेआम मिलावटी सामान बिक रहा है, वह प्रशासनिक तंत्र और खाद्य निरीक्षकों की मिलीभगत या उदासीनता को उजागर करता है। पटना और झारखंड के स्थानीय बाजारों से लेकर बड़े थोक विक्रेताओं तक आपूर्ति श्रृंखला में गुणवत्ता की जांच करने वाली प्रयोगशालाओं की भारी कमी है। मसाला निर्माताओं द्वारा अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में प्राकृतिक मसालों के साथ सिंथेटिक केमिकल, स्टार्च और सीसायुक्त रंगों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा समय-समय पर छापेमारी और नमूना संग्रह की कार्रवाई की जाती है, परंतु दोषियों के खिलाफ कड़े कानूनी दंड और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया के अभाव में इन अपराधियों के हौसले बुलंद बने हुए हैं। आम जनता को यह मालूम ही नहीं होता है कि वे जो पैकेटबंद या खुली वस्तुएं खरीद रहे हैं, वे प्रयोगशाला परीक्षणों में कितनी खतरनाक साबित हो सकती हैं। इस पूरी व्यवस्था में उपभोक्ता सबसे लाचार स्थिति में खड़ा नजर आता है जो अनजाने में अपने ही स्वास्थ्य के साथ एक बड़ा जोखिम मोल ले रहा है।
जनस्वास्थ्य पर गंभीर असर और सुधार की राह भोजन में इस प्रकार के विषैले पदार्थों का लगातार सेवन करने से आने वाले समय में गंभीर बीमारियों का खतरा और अधिक विकराल रूप धारण कर सकता है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए तो यह स्थिति और भी अधिक खतरनाक है क्योंकि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इन भारी धातुओं का मुकाबला करने में असमर्थ होती है। इस समस्या से स्थायी रूप से निपटने के लिए अब केवल औपचारिकता निभाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सरकार और स्थानीय प्रशासन को एक बेहद कड़ा और पारदर्शी निगरानी तंत्र विकसित करना होगा। प्रत्येक स्तर पर खाद्य नमूनों की नियमित जांच अनिवार्य की जानी चाहिए और मिलावटखोरों के खिलाफ आजीवन कारावास या भारी जुर्माने जैसे कड़े प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही, उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना होगा ताकि वे घटिया या संदिग्ध उत्पादों की तुरंत शिकायत कर सकें और अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए खुद आगे आ सकें। यदि समय रहते इस गंभीर समस्या पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके बेहद विनाशकारी परिणामों का सामना करना पड़ेगा।