अदालत ने खारिज की जमानत याचिका
वाराणसी जिले के विशेष न्यायाधीश एससी एसटी एक्ट सर्वजीत कुमार की अदालत ने फर्जी वसीयतनामा तैयार कराकर बेशकीमती जमीन हड़पने के आरोपी विजयबहादुर सिंह की जमानत अर्जी को सुनवाई के बाद खारिज कर दिया है। इस महत्वपूर्ण न्यायिक कार्यवाही के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता संतोष तिवारी के अलावा अधिवक्ता समीर कुमार मिश्रा, विनय शंकर राय और दिलीप मिश्रा ने न्यायालय के समक्ष मजबूती से पक्ष रखते हुए जमानत का कड़ा विरोध किया। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का गंभीरता से आकलन करने के बाद यह निर्णय सुनाया है। अभियोजन पक्ष ने न्यायाधीश को बताया कि इस गंभीर आपराधिक कृत्य में आरोपी की संलिप्तता स्पष्ट रूप से साबित होती है। इस कानूनी फैसले के बाद आरोपी की मुश्किलें और अधिक बढ़ गई हैं तथा उसे फिलहाल जेल में ही रहना होगा। स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बने इस प्रकरण में न्यायपालिका की कार्रवाई से पीड़ित पक्ष को बड़ी राहत मिली है।
कूटरचित दस्तावेजों का हुआ इस्तेमाल
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब वादी ने सिगरे थाने पहुंचकर इस धोखाधड़ी के संबंध में एक औपचारिक मुकदमा दर्ज कराया था। वादी ने अपनी शिकायत में पुलिस को बताया था कि उसकी सास राजपत्ती देवी का निधन वर्ष 2011 में ही हो चुका था। इसके पश्चात आरोपी जेठ ने अन्य सहयोगियों प्रेम कुमार और श्रवण कुमार के साथ मिलकर गहरी साजिश रची। इन सभी ने मिलकर कूटरचित दस्तावेज तैयार किए और एक अन्य महिला को दिवंगत मां राजपत्ती देवी के रूप में पेश किया। इसके बाद उप निबंधक सदर के कार्यालय में इस फर्जी वसीयतनामा का पंजीकरण करवा लिया गया। इतना ही नहीं, आरोपियों ने स्थानीय पार्षद के फर्जी लेटर पैड, उनके जाली हस्ताक्षर और मुहर का दुरुपयोग कर मृतका का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र भी बनवा लिया। बैनामा समेत कई अन्य संलिप्त दस्तावेजों के पुख्ता साक्ष्य अभियोजन पक्ष ने न्यायालय के समक्ष पेश किए। इन सभी साक्ष्यों के आधार पर अदालत को बताया गया कि अभियुक्त विजयकुमार ने अपने सगे छोटे भाई की विधवा पत्नी को उसकी वैध संपत्ति से बेदखल करने का घोर अपराध किया है।
पारिवारिक संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला पारिवारिक संपत्ति के लालच और धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है जिसमें एक महिला को उसकी अपनी ही कानूनी हकदारी से वंचित कर दिया गया। मृतका राजपत्ती देवी की मृत्यु के बाद उनके परिजनों के बीच चोलापुर स्थित पुश्तैनी जमीन को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई थी। आरोपी पक्ष ने मृतक महिला के नाम का गलत इस्तेमाल करते हुए प्रशासनिक कार्यालयों को भी धोखे में रखा। उप निबंधक कार्यालय में फर्जी वसीयत दर्ज कराने के लिए सुनियोजित तरीके से दस्तावेजों की जालसाजी की गई थी। स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक मुहरों व लेटर पैड का दुरुपयोग इस बात को दर्शाता है कि इस अपराध को बहुत ही शातिर तरीके से अंजाम दिया गया था। अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश किए गए तर्कों और साक्ष्यों ने इस पूरी साजिश की परतें खोलकर रख दीं। छोटे भाई की विधवा पत्नी को संपत्ति से बेदखल करने के इस मामले ने समाज में संपत्ति विवादों के दौरान होने वाली धोखाधड़ी पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत के इस रुख से साफ है कि फर्जीवाड़े के जरिए संपत्ति हड़पने वाले तत्वों को कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी।