प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिए पुलिस बल हुआ तैयार जनपद के विभिन्न थानों में तैनात सुरक्षा कर्मियों ने हाल ही में एक अनूठे प्रशिक्षण सत्र के दौरान हाथों के इशारों और विशेष मुद्राओं के माध्यम से संवाद स्थापित करने की कला सीखी है। इस नई पहल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जो नागरिक मौखिक रूप से अपनी शिकायत दर्ज कराने में असमर्थ हैं, उन्हें किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। आमतौर पर ऐसे मामलों में संवाद की कमी के कारण पीड़ितों को अपनी बात समझाने में भारी कठिनाई होती थी और पुलिसकर्मियों को भी उनका पक्ष समझने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की सहायता लेनी पड़ती थी। इस विशेष पाठ्यक्रम के पूरा होने के बाद अब सुरक्षाकर्मी सीधे तौर पर फरियादियों के हाव-भाव और संकेतों को समझ सकेंगे। गोरखपुर के थानों में आने वाले मूक-बधिर लोगों के लिए यह व्यवस्था बेहद मददगार साबित होने जा रही है क्योंकि अब उन्हें अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए किसी बाहरी अनुवादक या सहकर्मी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
अपराध नियंत्रण और जनसंवाद की दिशा में नया कदम अपराध और कानून व्यवस्था की देखरेख करने वाले पुलिस विभागों में इस तरह के समावेशी प्रशिक्षण की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। आधुनिक पुलिसिंग का यह तकाजा है कि समाज के हर वर्ग तक त्वरित और सुगम न्याय पहुंचे, चाहे वह शारीरिक रूप से किसी भी चुनौती का सामना कर रहा हो। पारंपरिक रूप से पुलिस थानों का माहौल कई बार ऐसे विशेष नागरिकों के लिए असहज हो जाता था क्योंकि वहां उनके अनुकूल संवाद साधने के साधन सीमित होते थे। इस प्रकार के कौशल विकास कार्यक्रमों से न केवल पुलिस बल की संवेदनशीलता में वृद्धि होती है बल्कि जनता के मन में कानून के रखवालों के प्रति विश्वास भी मजबूत होता है। जब एक पीड़ित व्यक्ति देखता है कि थाने का अधिकारी उसकी मूक भाषा को भी उतनी ही गंभीरता से ले रहा है जितनी कि किसी अन्य मौखिक शिकायत को, तो पुलिस और आम जनता के बीच का आपसी भरोसा कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह की पहलें पूरे राज्य के अन्य जिलों के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण पेश करती हैं।
भविष्य की व्यवस्था और जमीनी स्तर पर इसका असर इस नई दक्षता के जुड़ने से आने वाले समय में पुलिस अनुसंधान और त्वरित कार्रवाई के तरीकों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। यदि कोई मूक-बधिर व्यक्ति किसी आपराधिक घटना या दुर्घटना का शिकार होकर थाने पहुंचता है, तो पुलिस बिना एक पल गंवाए उसकी बात का मर्म समझकर तुरंत कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकेगी। प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि इस तरह के विशेष प्रशिक्षण शिविरों को समय-समय पर आगे भी आयोजित किया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक बल के जवानों को इस विधा में दक्ष बनाया जा सके। समाज के इस कमजोर और उपेक्षित समझे जाने वाले हिस्से को मुख्यधारा से जोड़ते हुए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य मशीनरी की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इस कदम के बाद गोरखपुर क्षेत्र में न्याय पाने की उम्मीद लेकर आने वाले हर एक जरूरतमंद व्यक्ति को एक नई राहत महसूस होगी और पुलिस प्रणाली की कार्यशैली में एक अधिक मानवीय चेहरा उभरकर सामने आएगा।