मानसिक समस्याओं को नजरअंदाज करने के खतरे
वाराणसी स्थित आयुर्विज्ञान संस्थान बीएचयू के मेडिसिन संकाय के प्रमुख और मनोचिकित्सक प्रोफेसर संजय गुप्ता ने लोगों को गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में आने वाले तनाव, उदासी, रात में नींद की कमी और रिश्तों में पैदा होने वाली उलझनों को लंबे समय तक अनदेखा नहीं करना चाहिए। जब इन शुरुआती लक्षणों की उपेक्षा की जाती है तो समय के साथ मानसिक स्थिति और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकती है। कई बार लोग अपनी आंतरिक परेशानियों को छुपाए रखते हैं और समय पर उचित कदम नहीं उठाते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनकी हालत इतनी अधिक बिगड़ जाती है कि वे निराशा के गहरे गर्त में चले जाते हैं। ऐसे तमाम मामलों में पीड़ित व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी या समाज के डर के कारण अकेलेपन से जूझते रहते हैं। जब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो कुछ लोग अपनी जीवन लीला समाप्त करने जैसा अत्यंत चरम और घातक कदम तक उठा लेते हैं। यह सब तब होता है जब लोग अपने मन की बात अपनों से साझा करने से कतराते हैं और समय रहते किसी भी प्रशिक्षित पेशेवर विशेषज्ञ से सलाह नहीं लेते हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि इन संकेतों को शुरुआती दौर में ही पहचान लिया जाए ताकि किसी भी अनहोनी घटना को समय रहते टाला जा सके।
विशेषज्ञ की सलाह और खुलकर बात करने की जरूरत
मनोचिकित्सक प्रोफेसर संजय गुप्ता ने समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने पर विशेष जोर दिया है। उन्होंने बताया कि हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को लेकर आज भी एक बहुत बड़ा सामाजिक भेदभाव और डर का माहौल बना हुआ है। लोग खुलकर अपनी भावनाओं के बारे में बात करने से डरते हैं क्योंकि उन्हें समाज द्वारा जज किए जाने का भय सताता रहता है। इसके अलावा उपचार प्राप्त करने में देरी करना और सही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच न होना भी समाज की बड़ी विसंगतियां हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी प्रकार की चुनौती पर खुलकर चर्चा करना और जरूरत पड़ने पर किसी डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक की सहायता लेना किसी भी तरह से इंसान की कमजोरी को नहीं दर्शाता है। यह कदम वास्तव में खुद के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाने का सबसे बेहतरीन तरीका होता है। परिवार का पूरा सहयोग और समय पर मिलने वाला सटीक इलाज किसी भी पीड़ित व्यक्ति को इन अंधेरे दौर से बाहर निकालने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यदि समय रहते लक्षणों को पहचान लिया जाए और उचित चिकित्सा पद्धति अपनाई जाए तो व्यक्ति सामान्य जीवन की तरफ लौट सकता है। इसके लिए समाज के हर वर्ग को आगे आकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है।
युवाओं के जीवन पर बढ़ता दबाव और खानपान की अनदेखी
आज के दौर में युवा वर्ग के सामने कई तरह की नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं जो उनके मानसिक संतुलन को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही हैं। प्रोफेसर संजय गुप्ता ने बताया कि परीक्षाओं का बढ़ता दबाव, बेहतरीन करियर की चिंता, रोजगार को लेकर फैली अनिश्चितता, समाज से अलगाव की भावना और आपसी रिश्तों में आने वाली खटास युवाओं को अंदर से तोड़ रही है। इन तमाम वजहों से युवा पीढ़ी भारी मानसिक दबाव का सामना कर रही है जो उनके संपूर्ण स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मानसिक अस्वस्थता का असर व्यक्ति के शारीरिक खानपान की आदतों पर भी साफ दिखाई देने लगता है। तनाव और मानसिक उलझनों के कारण कई लोग सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में भोजन करना बिल्कुल बंद कर देते हैं जिससे उनका शरीर कमजोर होने लगता है। इस प्रकार की शारीरिक और मानसिक कमियों को दूर करने के लिए जरूरी है कि हम अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या में सुधार करें। यदि किसी भी व्यक्ति को अपने आसपास या खुद के अंदर ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। समय पर भोजन न करने की आदत और मानसिक तनाव के लक्षणों को पहचानकर बिना किसी संकोच के तुरंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। यही एकमात्र ऐसा रास्ता है जो हमारे समाज को एक स्वस्थ और खुशहाल दिशा की ओर ले जा सकता है।