मारवाड़ की भूमि अपनी अनूठी जल संरक्षण संस्कृति और ऐतिहासिक बावड़ियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन समय के साथ उचित रखरखाव के अभाव में कई बावड़ियाँ कचरे और मलबे से पट गई थीं। जोधपुर नगर निगम ने इस गंभीर स्थिति को संज्ञान में लेते हुए आज सुबह से शहर की प्रमुख प्राचीन बावड़ियों की विशेष सफाई का महाअभियान आरंभ किया है। महापौर और निगम आयुक्त स्वयं मौके पर मौजूद रहकर इस अभियान की निगरानी करते नजर आए। स्थानीय नागरिकों, स्वयंसेवी संस्थाओं और एनसीसी के cadets ने भारी उत्साह के साथ इस श्रमदान में हिस्सा लिया और बावड़ियों के भीतर जमा गाद, प्लास्टिक कचरा और जंगली झाड़ियों को बाहर निकाला। अधिकारियों ने बताया कि यह अभियान केवल एक दिन का नहीं है, बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से शहर के सभी ऐतिहासिक जल स्त्रोतों पर लागू किया जाएगा।
पारंपरिक जल संरचनाओं का वैज्ञानिक जीर्णोद्धार
सफाई कार्य पूरा होने के बाद इन सभी बावड़ियों की दीवारों की संरचनात्मक मजबूती की जांच की जाएगी और पारंपरिक चूना-सुर्खी पलस्तर तकनीक का उपयोग करके उनका जीर्णोद्धार किया जाएगा ताकि पानी का प्राकृतिक रिसाव और संचयन सुचारू रूप से हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बावड़ियों के फिर से सक्रिय होने से न केवल भूजल स्तर में सुधार होगा, बल्कि गर्मी के दिनों में स्थानीय पर्यावरण भी संतुलित रहेगा। निगम प्रशासन ने इन स्थलों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने का भी निर्णय लिया है ताकि कोई अनहोनी न हो और असामाजिक तत्वों की गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके। इसके चारों ओर सुंदर फेंसिंग और लाइटिंग लगाने की भी योजना है ताकि पर्यटक भी यहाँ सुरक्षित रूप से आ सकें।
जन-सहभागिता और जागरूकता कार्यक्रम
इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देने के लिए नगर निगम द्वारा शहर के स्कूलों और कॉलेजों में विशेष जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें विद्यार्थियों को जल संरक्षण के ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया जा रहा है। स्थानीय आरडब्ल्यूए को भी इन जल स्त्रोतों की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है ताकि वे समय-समय पर इनकी स्वच्छता बनाए रखने में प्रशासन का सहयोग कर सकें। आज के इस पहले दिन के अभियान के दौरान ही टनक और नापला बावड़ी से कई मीट्रिक टन कचरा निकाला गया जिसे रीसाइक्लिंग प्लांट भेजा गया है। जोधपुर के बुजुर्ग नागरिकों ने इस पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह कदम हमारी खोई हुई सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर को वापस लाने में मील का पत्थर साबित होगा।