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मत्स्य संरक्षण की अनूठी पहल: लक्षद्वीप के तटों पर लुप्तप्राय हॉकसबिल कछुओं के प्रजनन में ऐतिहासिक वृद्धि

लक्षद्वीप के समुद्री जीव विज्ञानियों ने हिंद महासागर में हॉकसबिल कछुओं की आबादी में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता है।

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Kantap News डेस्क
18 अग 2026, 17:35
मत्स्य संरक्षण की अनूठी पहल: लक्षद्वीप के तटों पर लुप्तप्राय हॉकसबिल कछुओं के प्रजनन में ऐतिहासिक वृद्धि
पर्यावरण और समुद्री जीव विज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी सफलता सामने आई है। लक्षद्वीप द्वीप समूह के तटीय इलाकों में लुप्तप्राय प्रजाति के हॉकसबिल समुद्री कछुओं के घोंसले बनाने और उनके अंडों से बच्चों के बाहर आने की संख्या में इस वर्ष ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। समुद्री अनुसंधान संस्थानों द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन महीनों के दौरान कछुओं की इस प्रजाति के लगभग बारह सौ से अधिक नए बच्चे सुरक्षित रूप से समुद्र में छोड़े जा चुके हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वृद्धि पिछले कुछ वर्षों से स्थानीय प्रशासन और मछुआरों के सहयोग से चलाए जा रहे सख्त संरक्षण अभियानों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

समुद्री संरक्षण और मछुआरों की भूमिका

इस पूरी सफलता के पीछे स्थानीय मछुआरा समुदायों का विशेष योगदान रहा है, जिन्होंने स्वैच्छिक रूप से कछुओं के प्रजनन क्षेत्रों में मछली पकड़ने के पारंपरिक तरीकों पर प्रतिबंध लगा दिया था। वन विभाग और मरीन बायोलॉजिकल रिसर्च सेंटर के संयुक्त दल ने मिलकर तटीय क्षेत्रों में विशेष निगरानी चौकियां स्थापित की थीं, ताकि शिकारी अंडों को नुकसान न पहुँचा सकें। इसके अलावा, रात के समय तटों पर कृत्रिम रोशनी को नियंत्रित किया गया ताकि नवजात कछुए अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार समुद्र की ओर सही दिशा में जा सकें। इस पहल ने न केवल पारिस्थितिकी संतुलन को मजबूत किया है बल्कि यह साबित कर दिया है कि जनसहयोग से किसी भी विलुप्तप्राय प्रजाति को बचाया जा सकता है।

पर्यटन और भविष्य की कार्ययोजना

इस अभूतपूर्व सफलता के बाद लक्षद्वीप प्रशासन ने अब इन क्षेत्रों को इको-टूरिज्म के दायरे में लाने की एक नई योजना तैयार की है। पर्यटकों को बिना किसी व्यवधान के दूर से कछुओं के प्राकृतिक आवास देखने की अनुमति दी जाएगी, जिसके लिए सख्त मार्गदर्शिकाएँ बनाई गई हैं। वैज्ञानिक अब इन कछुओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट टैगिंग का उपयोग करने की तैयारी कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने भी भारतीय वैज्ञानिकों के इस प्रयास की सराहना की है और इसे हिंद महासागर क्षेत्र के समुद्री जीवन के लिए एक नया जीवनदान बताया है। आने वाले महीनों में इस मॉडल को देश के अन्य तटीय राज्यों में भी लागू करने पर विचार किया जा रहा है।
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